Friday, 10 February 2012

एक मैं और एक तू- movie review



'एक मैं और एक तू ' करन जौहर के धर्मा प्रोडक्शन और यू टीवी मोशन पिक्चर के बैनर तले बनी एक रोमांटिक फिल्म है जिसे शकुन बत्रा ने लिखा तथा निर्देशित किया है, पहले ये फिल्म 7 अक्टूबर 11 को रिलीज होने वाली थी, पर किसी कारण से इसे लेट करके वेलेंटाइन डे के सप्ताह पर प्रदर्शित किया जा रहा है. ये सप्ताह वैसे ही युवायों तथा उनकी मोहब्बत के नाम होता है, शायद इसलिए वेलेंटाइन डे का फायदा लेने के लिए इस हफ्ते रोमांटिक फिल्म को रोक कर रखा गया था.

इस फिल्म में राहुल कपूर (इमरान खान) , जो कि लॉस वेगास में रहता है, की अचानक जॉब चली जाती है, इस बात को घर वालो से छुपाकर रखता है, उसकी मुलाकात होती है रिहाना ब्रिगेंजा (करीना कपूर ) से. क्रिसमस की पहली रात को दोनों काफी शराब पी लेते है और नशे में वेडिंग चेपल जाकर शादी कर लेते है, जब अगली सुबह दोनों को होश आता है, तब उन्हें पता चलता है. अब उनके पास एक तो जॉब खोने का दुःख है और ऊपर से अचानक से  हुई शादी. दोनों जल्द से जल्द शादी तोड़ने का फैसला करते है. पर इस कार्यवाई में कुछ दिन लगते है, और इन दिनों में नायक और नायिका एक दूसरे को पसंद करने लगते है.
फिल्म का कांसेप्ट नया है, पर भारतीय दर्शक  जिनके लिए शादी का रिश्ता बहुत पवित्र माना जाता है, वहा पर पार्टी में मौज मस्ती करते हुए, बिना होशो खबर के शादी होने की घटना, जिस पर पूरी फिल्म आधारित है, को किस नज़रिए से देखेंगे, ये काबिले गौर है.  इस समय करीना कपूर का करीअर अपने शीर्ष पर है, चोटी के सभी खान कलाकारों के साथ वह काम कर रही है. शकुन बत्रा ने फिल्म का निर्देशन अच्छे तरीके से किया है. नायक और नायिका आज के ज़माने के लॉस वेगास में रहने वाले युवा है . फिल्म में इमरान एक इसे युवा बने है जो हर काम बच्चे की तरह अपने घरवालो से पूछ  पूछ  कर करते है. आज के ज़माने में लॉस वेगास में रहने वाला कोई 25 साल का युवा इस तरह कर सकता है, इसमें शक होता है. और दूसरी तरफ करीना कपूर का किरदार लगभग 'जब वी मेट' जैसा ही है. जिन्दगी के हर पर को इंजॉय करना उसकी आदत है. जब ये दोनों मिलते है. तो कुछ मनोरंजक से घटना क्रम होते है, जो दर्शकों को बांधे रखते है जो कि निर्देशन का कमाल है. सेकंड हाफ में फिल्म मुंबई शिफ्ट हो जाती है. कुछ सीन काबिले तारीफ है जैसे डाइनिंग टेबल के सीन. ये साधारण सी कहानी मनोरंजक अपने अच्छे अभिनय और मनोरंजक प्रस्तुतीकरण के कारण दर्शकों को पसंद आ सकती है.
फिल्म में करीना ने बेहतरीन अभिनय किया है, इमरान भी प्रभावित करते है, राम कपूर , रत्ना पाठक शाह और बोमन ईरानी ने भी अच्छा अभिनय किया है. अमित त्रिवेदी द्वारा दिया गया फिल्म का संगीत औसत रहा है. टाइटल सॉन्ग लोकप्रिय हो चुका है. इसके अलावा सारे गाने ठीक ठाक से है.
और संक्षेप में कहना चाहिए कि युवाओं को वेलेंटाइन वीक पर इस रोमांटिक मूवी को देखना चाहिए. 
स्टार 3 / 5
मनेन्द्र यादव

Friday, 3 February 2012

Gali gali chor hai- Movie Review


वर्ष 2011  की सबसे ज्यादा चर्चित घटनाओं में से एक थी अन्ना का भष्टाचार के खिलाफ आन्दोलन. यूं तो आम आदमी और भ्रष्टाचार के ऊपर काफी फ़िल्में आ चुकी है पर ये सबसे सही समय था इस फिल्म को रिलीज़ करने का . लेखक तथा निर्देशक रूमी जाफरी ने कई सफल फिल्मों जैसे 'गोलमाल रिटर्न्स', 'मुझसे शादी करोगी', 'मैंने प्यार क्यूँ किया' , ' चलते चलते' आदि के संवाद और स्क्रीनप्ले लिखा है और कई फिल्मों का निर्देशन भी किया है. अब हाजिर है हास्य तथा ड्रामे में रची बसी फिल्म " गली गली में चोर है " के साथ. 
फिल्म ' गली गली में चोर है ' कहानी है कि भष्टाचार किस तरह एक आम आदमी की जिंदगी को प्रभावित करता है,  भोपाल में रहने वाला भारत (अक्षय खन्ना ) एक बैंक में कैशियर की नौकरी करता है.जो कि एक शरीफ और सिद्धांतवादी आदमी है, उसके साथ उसकी पत्नी निशा (श्रिया सरन) और उसके पिता शिवनारायण (सतीश कौशिक ) रहते है.शिवनारायण के आदर्शवादी इन्सान है जो भष्टाचार मुक्त देश का सपना देखते है, पत्नी निशा भी हर भारतीय पत्नी कि तरह वो भी अपने पति भारत को बैंक का मेनेजर बनते देखना चाहती है,  भारत एक पार्ट टाइम एक्टर भी है जो कि रामलीला में हनुमान का किरदार निभाता है, पर रामलीला में भगवान राम का किरदार निभाना भारत के कई सपनो में से एक है. पर अभी तक राम का किरदार सत्तू त्रिपाठी (अमित मिस्त्री) ही कर रहा है, जो कि एक बेकार एक्टर है, पर उस इलाके के MLA मन्तु त्रिपाठी का छोटा भाई है.  
चुनाव के दौरान मन्तु त्रिपाठी , चुनाव कार्यालय खोलने के लिए भारत के घर में एक कमरे की मांग करता है, पर  पत्नी निशा के असहमत होने के कारण भारत, MLA को मना कर देता है. उनके घर में ख़ूबसूरत लड़की अमिता (मुग्धा गोडसे ) एक पेईंग गेस्ट के रूप में रहती है, जो कि कॉल सेंटर में काम करती है, इधर दोनों त्रिपाठी भाई , भारत से बदला लेने का मौका ढूढ़ते है, तथा कांस्टेबल परशुराम कुशवाहा (अन्नू कपूर) की मदद से भारत तथा उसके पिता को टेबल फैन चुराने के एक झूठे केस में फंसा देते है, इस आफत से बचने के लिए भारत क्या  क्या करता है, ये हास्य में लपेट कर दिखाया जाता है. 
मोमोक्षु मुदगल की कहानी अच्छी है पर जिस तरह के घटना उन्होंने पेश की वो फिल्म नहीं टीवी सीरियल के स्तर की लगती है, बेशक ये कहानी आज़ाद भारत के आम आदमी की कहानी है, पर जहा हर युवा धीरुभाई अम्बानी से प्रेरित है, वहां पर युवा देश के भ्रष्टाचार के बारे में कहा सोचते है, अगर कुछ सोचते भी है, तो फिल्म की घटनाये उन्हें ऐसा करने के लिए प्रेरित नहीं करती.फिल्म को जल्दबाजी में समेटा गया है. फिल्म के कुछ सीन दिलचस्प है जैसे टेबल फैन को ठिकाने लगाने वाले सीन, चोर , हवलदार और गवाह वाले सीन. बीच बीच में कुछ बोरियत भी दर्शकों को झेलनी पड़ती है, चुन्नू फ़रिश्ता (विजयराज ), बच्चू गुलकंद , पानवाला जैसे कुछ दिलचस्प किरदार भी आते है. वीना मालिक के आइटम सॉन्ग 'छन्नो' को रखने का कोई उचिंत कारण नजर नहीं आता.

अक्षय खन्ना ने आम आदमी का किरदार बहुत अच्छी तरह पेश किया है, आम आदमी की मजबूरी, लाचारी और गुस्से को अच्छी तरह दिखाया है, श्रिया सरन और मुग्धा गोडसे के लिए करने लायक ज्यादा कुछ नहीं था. मुग्धा वाला  ट्रैक सही से नहीं लिखा गया. सतीश कौशिक प्रभावित करते है, फिल्म में सबसे बेहतरीन रोल अन्नू कपूर ने भ्रस्त पुलिस वाले  निभाया है. इनके अलावा अखिलेन्द्र मिश्र, विजयराज , अमित मिस्त्री अपना अपना असर छोड़ने में कामयाब रहे. 
फिल्म का सबसे बड़ी खूबी इसकी कास्टिंग है, सभी मंजे हुए कलाकार होने से फिल्म देखने में मजा आता है, फिल्म के संवाद अच्छे है, और सबसे बड़ी खामी है कि फिल्म के क्लाइमेक्स को सही से नहीं लिखा गया . 
और संक्षेप में कहा जा सकता है, कि  अच्छे कलाकारों तथा अच्छे उद्देश्य के कारण एक बार देखा जाना चाहिए.
स्टार 2 .5 / 5 

द्वारा 
मनेन्द्र यादव 

Friday, 27 January 2012

Agneepath - Movie Review

इन दिनों दर्शकों कि रूचि में खासा परिवर्तन देखने को मिल रहा है, उन फिल्मों को पसंद किया जा रहा है जो 80 - 90 के दशकों में पसंद की जाती थी, जिसमे फिल्म का नायक लार्जर देन लाइफ होता था, जो अपने माता या पिता की मौत का बदला लेने के लिए, खूंखार विलेन से भिड़ता था. इन फिल्मों में दर्शकों को शुरू में ही पता चल जाता था कि फिल्म के अंत में क्या होगा, पर रूचि ये देखने में रहती थी कि कैसे होगा.

1990  में मुकुल एस आनंद द्वारा निर्देशित फिल्म अग्निपथ आई थी, इस फिल्म में महानायक अमिताभ बच्चन ने अपनी आवाज बदल कर संवाद बोले थे, जो की दर्शकों की समझ में नहीं आये थे. उस फिल्म के फ्लॉप होने का यही कारण माना गया. कुछ समय बाद अमिताभ ने अपनी मूल आवाज में दोबारा डबिंग करके जब टीवी पर दिखाया गया तो फिल्म को काफी सराहा गया.
फिल्म शुरू होती है 1977 में महाराष्ट्र के एक गाँव मंडवा से , जहा एक आदर्शवादी, स्वाभिमानी मास्टर दीनानाथ चौहान , जो हमेशा गाँव के भले के लिए काम करता है, दीनानाथ चौहान की बढती हुई इज्ज़त उसी गाँव के कांचा (संजय दत्त )की आँखों में चुभने लगती है, कांचा गाँव वालों की ज़मीन हडपने का प्लान बनाता है, जिसमे दीनानाथ रुकावट  बनता है,  इसलिए कांचा एक षड़यंत्र में दीनानाथ को फंसाकर, गांववालों के सामने मारकर  बरगद के पेड़ पर लटका देता है, ये सब कुछ दीनानाथ  के बेटे विजय (मास्टर आरीश ) और उसकी माँ (जरीना बहाव ) के सामने होता है, इस घटना के बाद विजय की माँ विजय को लेकर मुंबई आ जाती है, और एक बच्ची को जन्म देती है, लेकिन विजय (ऋतिक ) की आँखों में कांचा से बदला लेने का सपना पलता रहता है, जिसके लिए वो मुंबई के गैंगस्टर रउफ लाला (ऋषि कपूर ) के गैंग  में शामिल होकर उसका खास बन जाता है, और कुछ उतार चढाव के बाद अंत में कांचा से बदला लेने में कामयाब होता है,
फिल्म की गति शुरू में खासी तेज रहती है, पर इंटरवल तक आते आते थोड़ी धीमी हो जाती है, पर दर्शकों की रूचि बनी रहती है, फिल्म में बाल विजय का किरदार अच्छे तरीके से स्थापित किया गया है, और खासतौर से संजय दत्त का. फिल्म में संजय बहुत ही डरावने और भयानक लगते है. मूल फिल्म से इस फिल्म में थोडा बदलाब देखने को मिलता है, जैसे की मूल फिल्म विजय (अमिताभ ) का लुक दर्शकों को बहुत पसंद आया था उनके द्वारा पहना हुआ सफ़ेद सूट, आँखों में सुरमा, मुह में पान , बार बार अपना परिचय देना और अजीब तरीके से बैठना, या सब इस फिल्म में गायब  है, मूल फिल्म में अमिताभ के संवाद और उनका अभिनय पूरी फिल्म की जान था. पर इस फिल्म में ऋतिक को बहुत कम बोलने का मौका मिला है, ये बात दर्शकों को खटक सकती है. 
ऋतिक रोशन ने उम्दा अभिनय किया है पर उनके किरदार को मूल फिल्म की तरह न पेश करना थोडा अखर
सकता है, प्रियंका चोपड़ा  के लिए कुछ करने के लिए नहीं था. संजय दत्त इस फिल्म की जान है, उनका ये किरदार सालों तक याद रखा जा सकने वाला है, उनके लुक बॉडी लेंग्वेज , संवाद सभी प्रभावित करते है, कह सकते है की ये फिल्म खलनायक प्रधान फिल्म है,  फिल्म के अन्य किरदार जैसे गायतोंडे (ओमपुरी ), सूर्या,   शांताराम शिक्षा आदि को अच्छी तरह निर्देशक ने पेश किया है, ऋषि कपूर का अभिनय बेहतरीन है, फिल्म के कुछ संवाद बहुत चुटीले है, जैसे की " कमजोर कभी ये नहीं कह सकता की उसने पहलवान को माफ़ किया, उसके लिए उसका पहलवान बनना जरुरी है, ऋषि कपूर का संजय दत्त को कहना " मैंने बदसूरत चेहरे बहुत देखे है पर तेरे चेहरे से घिन टपकती है, "
क्लाइमेक्स में फिल्म का फिल्मांकन अच्छा किया गया है, फिल्म का स्क्रीनप्ले कसा हुआ है, जो कि फिल्म को दर्शकों तक जोड़ता है, निर्देशक कारण मल्होत्रा ने फिल्म पर अच्छी पकड़ बनाई है, फिल्म के गाने " देवा", " गुनगुना" और "चिकनी चमेली " पसंद किये जा रहे है, " चिकनी चमेली " गाने को सही जगह पर रखा गया है, फिल्म कि लोकेशन और सिनेमेटोग्राफी बढ़िया है, 
और अंत में 'अग्निपथ " कोई अलग तरह कि फिल्म नहीं है, पर अच्छे अभिनय , स्क्रीनप्ले और बीते दौर कि ड्रामा फिल्मों को याद करने के लिए एक बार देखा जा सकता है, 
रेटिंग  3/5

द्वारा 
मनेन्द्र यादव 


Friday, 6 January 2012

Players- Movie Review

निर्देशक द्वय अब्बास मस्तान बोलीवुड में बेहतरीन थ्रिलर फिल्मों के लिए जाने जाते है, ' खिलाडी', 'बाजीगर' , 'हमराज', 'दरार', ' एतराज ', ' रेस' आदि उनकी द्वारा निर्देशित फ़िल्में है, अपनी फिल्मों में वे होलीवुड की फिल्मों का विशुद्ध भारतीयकरण कर देते है, पर इस बार उन्होंने होलीवुड की 1969 में बनी फिल्म ' द इटालियन जॉब' के हिंदी रीमेक के अधिकार खरीद कर ' प्लेयर्स ' बनाई है,

चार्ली (अभिषेक बच्चन ),  रशिया से रोमानिया भेजे जा रहे 10 हज़ार करोड़ रूपये के सोने को चुराने का प्लान बनाता है, पर ये बहुत ही मुश्किल काम है जिसको चार्ली अकेला नहीं कर सकता इसलिए उसको कुछ साथियों की जरुरत पड़ती है, जिसके लिए उसका गुरु विक्टर दादा (विनोद खन्ना)  उसके लिए एक टीम बनाने में मदद करता है,  जिसमे ब्लास्ट एक्सपर्ट बिलाल (सिकंदर खेर ), जादूगर रोनी (बोबी देओल), स्पाइडर (नील नितिन मुकेश), रिया (विपाशा बासु ), नैना (सोनम ) और मेकअप एक्सपर्ट सनी (ओमी वैद्य) है, पूरी टीम इस चोरी को वारदात को अंजाम देती  है, चोरी के बाद कोई एक सदस्य गद्दारी करता है, उस गद्दार से बाकी के सदस्य सोना वापस लाने में कामयाब होते है. ये घटनाक्रम बहुत से छोटे छोटे घटनाओं को जन्म देते है, जो की फिल्म को दिलचस्प बनाते है,

फिल्म के स्क्रीनप्ले में कुछ दृश्य ऐसे रखे गए है, जो की ओरिजिनल फिल्म में नहीं थे, जिनकी वजह से दर्शकों को थोड़ी बोरियत हो सकती है,कहानी बेहतरीन है पर , फिल्म का स्क्रीनप्ले में कई खामियां है, लगता है, कि जुगराज ने बेमन से स्क्रीनप्ले लिखा है,  प्रीतम का  संगीत अच्छा है, तथा लोकप्रिय हो चुका है, फिल्म में स्टाइल और लोकेशन होलीवुड स्तर की है, बीच में कुछ जगह पर फिल्म बोझिल हो जाती है, पर ट्रेन से  चोरी का सीन बहुत ही खूबसूरत फिल्माया गया है, फिल्म के एडिटर का काम भी बहुत मुश्किल रहा होगा. काफी मेहनत करनी पड़ी होगी,

अभिषेक बच्चन ने इस फिल्म में 'धूम ', 'धूम-2 ", ब्लफमास्टर', 'दस', और ' दम मारो दम ' के जैसा ही स्टाइलिश रोल किया है, कई जगह बहुत प्रभावी नजर आते है, , बोबी देओल का किरदार ठीक से नहीं लिखा गया,उनके कुछ सीन जबरदस्ती घुसाए हुए लगते है,  सोनम और सिकंदर ने निराश किया, बिपाशा का अभिनय अच्छा है और उनकी खूबसूरती का फिल्म में सही उपयोग किया गया है, नील मुकेश का काम प्रभावी है, ओमी वैद्य ने कुछ जगह दर्शकों को हंसाया. विनोद खन्ना के करने के लिए कुछ नहीं था. 

और अंत में कहना चाहिए कि ये  फिल्म अब्बास मस्तान की पिछली फिल्मों से उन्नीस है, पर स्टाइलिश प्रस्तुतीकरण और रोचक कहानी की वजह से एक बार देखी जा सकती है.
स्टार 2 /5
मनेन्द्र यादव

Friday, 23 December 2011

Don 2- Movie Review

शाहरुख़ भले ही लाख तरीकों से सबको समझाने की कोशिश करे की 'रा वन' सफल हुई है, पर इन तरीकों से वो सिर्फ खुद की तसल्ली कर सकते है. किसी भी सितारे की फिल्म के हिट या फ्लॉप होने का असर उसकी आने वाली फिल्मों पर जरुर पड़ता है, इसलिए रा वन के पिटने की वजह से "डौन २" की जुड़े लोग भी डरे हुए है, क्योकि शाहरुख़ को दर्शक रोमांटिक फिल्मों में ही ज्यादा पसंद करते है,  जिन फिल्मों में  शाहरुख़ ने इमेज बदलने की कोशिश की है, वो फ़िल्में अच्छा बिज़नस नहीं कर पाई.  जैसे "रा वन " , "बादशाह" ," डुप्लीकेट", "अशोका", "स्वदेस", "फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी" आदि . अब देखते है की "डौन  २"  का हश्र क्या होता है, निर्देशक फरहान अख्तर ने इस फिल्म का जोर शोर से प्रमोशन नहीं किया, हो सकता है कि उन्हें लगता हो कि दर्शक अब शाहरुख़ कि फिल्म के सिर्फ प्रमोशन को देखकर फिल्म देखने नहीं आएंगे.( रा वन का हश्र देखने के बाद ). बहरहाल दुनिया के 41 देशों में आज "डौन २" 2 डी और 3 डी प्रिंटों में रिलीज हुई है.
1978 में अमिताभ बच्चन अभिनीत फिल्म "डौन" का रीमेक फरहान अख्तर ने  " डौन : द चेज बिगिन्स अगेन" 2006 में बनाया. और अब 2011 में उसका सीक्वल " डौन 2 : द किंग इज बैक" आज रिलीज हुआ. किसी फिल्म के रीमेक को बनाने में ज्यादा सोचने कि जरुरत नहीं होती क्योकि सबकुछ सामने होता है और उसे कॉपी करना पड़ता है, लेकिन "डौन २" में निर्देशक ने अपने लेखकों के साथ मिलकर कुछ होलीवुड फिल्मों का थोडा थोडा मसाला डालकर इस सीक्वल को लिखा.
डौन  (शाहरुख़ खान ) पिछली बार धोखे से पुलिस से बचकर निकल गया था, अब पूरे एशिया पर कब्ज़ा जमाने के बाद यूरोप को टारगेट बनता है, जिसके लिए उसे वर्धान (बोमन ईरानी ) की मदद चाहिए, लेकिन वो मलेशिया कि जेल में बंद है. इसलिए डौन  मलिक (ओमपुरी ) और रोमा (प्रियंका चोपड़ा ) के सामने सरेंडर करके उसी जेल में जाता है , जिसमे वर्धान को रखा गया है,
डोन एक टेप के जरिये जेके दीवान और एक जर्मनी के बैंक के प्रेसिडेंट को ब्लैकमेल करना चाहता है लेकिन वो टेप एक लॉकर में रखा है. डौन और वर्धान के पास एक एक चाबी है, जिनके जरिये वो लॉकर खुलता है, डौन और वर्धान जेल से भाग निकलते है, दोनों उस टेप को जेके दीवान को दिखाकर बैंक में रखी यूरो करंसी छापने कि प्लेट का एक्सेस कोड चाहते है, डौन उन प्लेट की सहायता से यूरो छापकर अमीर बनना चाहता है. दीवान एक गुंडे जब्बार के जरिये डोन को ख़त्म करने कि  कोशिश करता है, पर डौन उसे अपने साथ मिला लेता है, एक्सेस कोड पाने के बाद डौन को भारी सुरक्षा में रखी प्लेट को चुराने के लिए  टेक्निशियनों को जरुरत पड़ती है, जिसके लिए वो समीर (कुनाल कपूर ) को मिला लेता है, प्लेट मिलने के बाद जब्बार और वर्धान मिल जाते है और डौन को समीर कि सहायता से पुलिस को पकडवा देते है,  इसके बाद फिल्म में कुछ उतर चदाव आते है, जिसको थ्रिल और सस्पेंस के साथ पेश किया गया है, फिल्म के पहले हाफ में थोड़ी बोरियत सी हो सकती है, क्योकि बहुत सारी प्लानिंग होती है, और सेकंड हाफ में जब प्लान के अनुसार कहानी बदती है तब दर्शकों कि दिलचस्पी बदने लगती है, क्लाइमेक्स काफी बड़ा दिखाया गया हैं, और अंत में डौन 3 के लिए गुंजाईश भी रखी गई है ,
तकनीकी रूप से फिल्म बहुत सशक्त है, फरहान ने कहानी को बड़े स्टाइलिश तरीके से पेश किया है, सेकंड हाफ में कई ऐसे दृश्य आते है जो दर्शकों को चौंका सकते है, यही भाग फिल्म को दिलचस्प बनाता है,ऋतिक रोशन वाले दृश्य को बिना वजह ठूसा गया है,  डौन का किरदार नकारात्मक होते हुए भी दर्शकों का  समर्थन पाता है, शाहरुख़ का अभिनय अच्छा है, कई दृश्य में ओवर एक्टिंग के शिकार हुए, प्रियंका चोपड़ा के करने के लिए कुछ नहीं था, फिल्म में रोमांस के लिए जगह नहीं है, बोमन, ओमपुरी, कुनाल कपूर, नवाब शाह का अभिनय उल्लेखनीय है, लारा दत्ता का उपयोग नहीं हो पाया, शंकर एहसान लॉय का संगीत निराशाजनक है, फिल्म का एक भी गाना लोकप्रिय नहीं हो पाया,
संक्षेप में कहा जाये तो फिल्म स्टाइलिश है, और ध्यान से देखने वाले दर्शकों का मनोरंजन कर सकती है, जिसके लिए एक बार देखा जा सकता है, 

स्टार 2 .5 / 5

मनेन्द्र यादव

Monday, 12 December 2011

ladies vs ricky bahl- review

निर्देशक मनीष शर्मा की " बैंड बाजा बारात" के अच्छे बिज़नस को देखते हुए, यश कैंप ने पूरी टीम को उपहार स्वरुप एक और फिल्म बनाने का मौका दिया. फिल्म का प्रमोशन भी जमकर किया गया जैसा की आजकल हर फिल्म की अच्छी ओपनिंग के लिए जरुरी हो गया है,
फिल्म में रिक्की बहल (रणवीर सिंह) एक बहरूपिया है जो की नाम, रूप बदल कर भारत के कई शहरों में लड़कियों को अपने जाल में फंसाता है, और उनसे लाखों रूपये की ठगी करता है, लडकियां अपना पैसा वापस लेने और बदला लेने की नीयत से एक बहुत तेज तर्रार लड़की ईशिका (अनुष्का) को तैयार करती है, फिर कैसे रिक्की बहल सुधर जाता है, ये फिल्म में दिखाया गया है,
फिल्म का पहला भाग थोडा मनोरंजक है, क्योंकि उसमे रिक्की बहल, लड़कियों को बेवकूफ बना कर ठगता है, जिस तरह बड़ी आसानी से लड़कियों और उनके परिवार वालों को बेवकूफ बनाता है वो कुछ गले से नहीं उतरते. यहाँ फिल्म के मनोरंजक के नाम पर ज्यादा छूट ले ली गई है, सेकंड हाफ में फिल्म बोरियत की शिकार हो जाती है, मनोरंजन का स्तर गिरने लगता है, फिल्म खिची खिची सी लगने लगती है, दर्शकों में फिल्म से दूर होने लगते है, अंत भी दर्शकों को निराश कर सकता है, जब लड़कियां रिक्की को बेवकूफ बनाने की कोशिश करती है, उन दृश्यों को ठीक से नहीं लिखा गया. स्क्रीनप्ले भी निराश करता है, निर्देशक ने दर्शकों को खुश करने के चक्कर में  रोमांस दिखाया गया है, जो की जबरदस्ती का ठूसा हुआ लगता है.

अनुष्का शर्मा को जिस तरह तेज तर्रार दिखाया है उस तरह के सीन नहीं लिखे गए, रणवीर का किरदार पहली फिल्म (बैंड बाजा बारात) और इस फिल्म में लगभग एक सा ही नजर आता है, फिल्म के अंत में जिस तरह रणवीर का किरदार शांत हो जाता है और सुधर जाता है, वहा पर ज्यादा मेहनत नहीं की गयी. उसके बुरे आदमी से भले बननी की कहानी दिलचस्प नहीं है.
रणवीर ने अच्छा प्रयास किया है, अनुष्का कही कही ओवर एक्टिंग का शिकार हो गई, परिणिति चोपड़ा, दीपानिता शर्मा, अदिति शर्मा ने ठीक काम किया है, जिसमे परिणिति चोपड़ा के कुछ दृश्य याद रहते है, सलीम सुलेमान ने फिल्म का संगीत अच्छा दिया है, जिसमे " आदत से मजबूर" गाना याद रहता है,

संक्षेप में कहा जाये तो  " लेडिस वर्सेस रिक्की बहल" में मनोरंजन की उम्मीद करना बेकार है.
स्टार 1.5 /5


मनेन्द्र यादव

Friday, 14 October 2011

Azaan- Movie Review

दिवाली के पहले के एक दो हफ्ते फिल्म बिजनेस के लिए अच्छे नहीं माने जाते, इस वक़्त कोई भी निर्माता अपनी फिल्म को रिलीज़ करने से बचता है, क्योंकि दिवाली की तैयारियों में सभी व्यस्त रहते है. पर कुछ छोटी बजट की फिल्मों के लिए दर्शकों तक पहुँचने का ये सही मौका होता है क्योंकि इस वक़्त अच्छे थियेटर खाली मिलते है.  इस हफ्ते 5 फिल्मे रिलीज़ हुई  है अजान, मुझसे फ्रेंडशिप करोगी, माय फ्रेंड पिंटू, जो डूबा सो पार,और मोड़. इन सभी को एक दूसरे से थोडा बहुत नुक्सान तो होगा ही, पर अजान और मुझसे फ्रेंडशिप करोगी के नाम ज्यादा उभरकर आते है,

बात करते है अजान की,  रौ में कम करने वाला एक आर्मी ऑफिसर अजान खान (सचिन जोशी) एक बहादुर इंसान है, जिसे हम वन मैन आर्मी कह सकते है, जो एक अंतर्राष्ट्रीय मिशन पर है, एक डॉक्टर जो पहले सीआईए  का एजेंट था, एक अबोला नामक वाइरस के जरिये दुनिया में तबाही मचाना चाहता है, वो अपना निशाना भारत को बनाता है, और अजान खान किस तरह से उसका सपना चकनाचूर करता है, ये बड़े ही स्टाइलिश लुक में प्रकाश चड्डा द्वारा निर्देशित की गई फिल्म में दिखाया गया है,

फिल्म की खासियत इसकी सिनेमेटोग्राफी, स्टाइलिश लुक, लोकेशन आदि है. पर पूरी फिल्म इतनी तेज गति से चलती है की दर्शक फिल्म से अंत तक नहीं जुड़ पता. दर्शक कहानी के अनुसार जिस सीन की उम्मीद करता है उससे एक कदम आगे का सीन दिखाया जाता है, हर किरदार भाग रहा है , तकनीकी बातें हो रही है, मशीनों के द्वारा काम चल रहा है, अलग अलग देशों की लोकेशन दिखाई गई है, इन सबका इतना ओवरडोज दिया गया है और इस तरह से दिखाया गया है कि दर्शक कन्फ्यूज हो जाते है, फिल्म कि एडिटिंग भी कमजोर है, दो सीन के बीच में जुडाव नजर नहीं आता. फिल्म की हीरोइन केंडिस वाउचर प्रभावित करती है और छोटे से रोल में फिल्म का ग्लैमर बढाती है बल्कि, पर नायक के साथ प्रेम कहानी फीकी सी नजर आती है.

 इस तरह की अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद के खिलाफ लड़ने वाले हीरो के रोल में कोई अंतर्राष्ट्रीय ना सही पर बड़ा स्टार होना चाहिए था,  सचिन जोशी में स्टारों वाली बात नहीं है, उनकी एक्टिंग भी कमजोर है, डायलोग डिलीवरी भी ठीक नहीं है,  इसलिए वे इस रोल में फिट नहीं होते. आर्य बब्बर और रविकिशन ओवर एक्टिंग करते दिखे. अपने फिल्मांकन और तकनीकी रूप से फिल्म होलीवुड की फिल्मों का मुकाबला करती है, पर कमजोर स्क्रीनप्ले, एडिटिंग और स्टारकास्ट की वजह से फिल्म उस उंचाई पर नहीं पहुँच पाती.

संक्षेप में कहा जाये तो  फिल्म बहुत एकाग्रता की मांग करती है.
स्टार 1 .5
द्वारा
मनेन्द्र यादव ,

Saturday, 8 October 2011

Rascals- Movie Review

डेविड धवन ने अपनी कॉमेडी फिल्मों से हमेशा दर्शकों को गुदगुदाया है, पर न जाने क्यों उनकी फिल्मों में वो पहले जैसी बात नहीं रही, डेविड कि कॉमेडी  फ़िल्में भले ही तर्कहीन होती हो पर दर्शकों का बहुत उम्दा मनोरंजन तथा हंसने के लिए मजबूर करती है, जिस विषय पर रास्कल्स बनाई गई है, उसी विषय पर डेविड धवन ने  गोविंदा और अनिल कपूर को लेकर 'दीवाना मस्ताना' तथा सलमान और अक्षय को लेकर 'मुझसे शादी करोगी' जैसी सुपर हिट फिल्मों का निर्देशन किया था. वही निर्देशक और वही विषय होने के बावजूद भी ये फिल्म 'दीवाना मस्ताना' और 'मुझसे शादी करोगी' से कोसो दूर है, एक अच्छी कॉमेडी फिल्म के लिए सिचुएशन, एक्टिंग, टाईमिंग, संवाद बहुत जरुरी होते है, पर इस फिल्म में हर चीज कि थोड़ी थोड़ी कमी है.
फिल्म में कहानी और स्क्रिप्ट बेदह कमजोर है,  चेतन (संजय दत्त ) और भगत (अजय देवगन)  दो छोटे मोटे चोर है, दोनों ही एक अमीर लड़की (कंगना ) को पटाने कि कोशिश करते है. कंगना के करीब जाने और उससे चिपकने के लिए ऊंटपटांग हरकते करते है.ये स्पष्ट नहीं है कि कंगना कौन है तथा दोनों को कंगना के पैसो में ज्यादा दिलचस्पी है या उसकी खूबसूरती में. उसके  पूरी फिल्म बैंकोक के एक सेवन स्टार होटल में शूट की गयी है, होटल के हर हिस्से में कोई न कोई सीन शूट किया गया है,  कई फिल्मे बिना स्क्रिप्ट और कहानी के भी अच्छे निर्देशन और और प्रस्तुतीकरण की वजह से दर्शकों द्वारा पसंद की जाती है, पर इस फिल्म का स्क्रीनप्ले बहुत घटिया है,फिल्म में अर्जुन रामपाल भी नजर आते है पर उनके पास करने को कुछ ज्यादा नहीं था. फिल्म में अंत में दर्शकों को जरा सा चौकाया गया है, पर ये काफी नहीं है, नई हीरोइन लीसा हेडन ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई, आइटम नंबर में प्रभावित करती है, सतीश कौशिक, चंकी पाण्डेय, अनिल धवन भी नजर आते है.
लगता है कि दर्शक अब संजू बाबा को कॉमेडी फिल्मों में नहीं देखना चाहते , तभी उनकी इस साल 'डबल धमाल', 'चतुर सिंह 2 स्टार' को दर्शकों ने पसंद नहीं किया   संजय दत्त इस फिल्म के निर्माता है तो उन्हें तो फिल्म में होना ही था, पर इस किरदार में वे अब फिट नहीं बैठते, अब उन्हें कंगना जैसी हीरोइनों के साथ रोमांस करते देखना अजीब लगता है, अजय देवगन ने अच्छा काम किया है और फिल्म कि कमियों कि कवर करने कि पूरी कोशिश भी की है, फिल्म में विशाल शेखर का संगीत औसत है,
संक्षेप में कहा जाये तो  फिल्म से ज्यादा उम्मीद लगाना बेकार है, फिल्म का कोई भी हिस्सा सशक्त नहीं है.
स्टार 2 /5

मनेन्द्र यादव 
द्वारा
मनेन्द्र यादव

Friday, 30 September 2011

Force - Movie Review

जब से बॉलीवुड में दबंग और सिन्घम में सौ करोड़ से ज्यादा का बिज़नस किया है तबसे लगता है सभी दक्षिण भारतीय फिल्मों के रिमेक बनाने में जुट गए है,  ताज़ा फिल्म 'फ़ोर्स' भी दक्षिण भारतीय फिल्म 'काखा काखा' का हिंदी रिमेक है ,जिसे निर्देशित  किया है निशिकांत कामत ने. पर ये फिल्म दबंग और सिन्घम से कोसों दूर है . हिंदी सिनेमा की सबसे सामान्य कहानी यानी कि एक ईमानदार, बहादुर और  नेक  पुलिस ऑफिसर की एक दुष्ट खूंखार अपराधी से भिडंत होना और  आखिरी में नायक का खलनायक को मार गिराना, फोर्स की कहानी भी कुछ इसी तरह की है. 

एसीपी यशवर्धन ( जॉन अब्राहिम ) एक ईमानदार, बहादुर इंसान है, जो कि किसी तरह के रिश्तो में नहीं उलझना चाहता क्योकि उसका मानना है कि रिश्तो से इंसान कमजोर हो जाता है , जिससे दुश्मन उसकी कमजोरी का फायदा उठा सकता है, इसलिए वह लड़कियों से भी दूर रहता है,जिसके कारण उसके साथी यश को सूखा पेड़ कहते है  इसके बावजूद भी माया ( जेनेलिया डिसूजा ) उसका दिल जीत लेती है और यश को माया से प्यार हो जाता है. विष्णु (विद्युत् जमवल) नाम का अपराधी एक मुखबिर के जरिये सूचना देकर अपने दृग्स और स्मगलिंग के धंधे में अपने प्रतिद्वंदी को जॉन के द्वारा मरवा देता है, इस बात का यश को पता चलते ही वो विष्णु को पकड़ने में लग जाता है, एक माल में दृग्स का लें दें करते समय विष्णु का बड़ा भाई (मुकेश ऋषि ) यश और उसके साथियों अतुल , कमलेश और अन्य के हाथों मारा जाता है जाता है, जिसके कारण पुलिस डिपार्टमेंट इन चारों ऑफिसर्स को सस्पेंड कर देता है, विष्णु अपने बड़े भाई की मौत का बदला लेना चाहता है, फिर शुरू होता है, इन चारों ऑफिसर्स और विष्णु का लुका छिपी का खेल. और अंत में विष्णु किस तरह मारा जाता है. ये फिल्म में एक्शन के साथ दिखाया गया है,
फिल्म का पहला हाफ रोमांटिक है ,जिसमे जेनेलिया और जॉन का प्रेम प्रसंग दिखाया है , लडकियों से सामान्यता दूर रहने वाले जॉन को जेनेलिया अपनी प्यारी और मासूम बातों से प्यार करने को मजबूर कर देती है, इस हिस्से में कुछ अच्छे सीन देखने को मिलते है,  दूसरे हाफ में रोमांस गायब हो जाता है, एक्शन शुरू हो जाता है, पर कहानी सधी हुई तब से लगती है जब से विष्णु, जॉन के घर पर हमला करता है, उससे पहले तक की कहानी सिर्फ खाली जगह को भरने  जैसी लगती है, एक्शन फिल्म में अच्छा है, कुछ सीन दर्शकों को पसंद आ सकते है जैसे गली के गुंडों का तेजाब डालने वाला सीन, विष्णु और जॉन का पहला सामना.जॉन का चेहरा भावहीन रहता है जो इस तरह के कैरेक्टर के लिए उपयुक्त है , जेनेलिया ने जॉली गर्ल का किरदार खूब निभाया है, विष्णु जब जब स्क्रीन पर आते है अच्छा लगता है उन्होंने स्टंट भी अच्छे किये है , जॉन की बॉडी का खूब प्रदर्शन किया गया है, निर्देशक को स्क्रिप्ट का साथ नहीं मिला , इस तरह की कहानी का दर्शकों को पसंद आना मुश्किल है , फिल्म का संगीत ज्यादा लोकप्रिय नहीं हो पाया है.
संक्षेप में कहा जाये तो  इस फिल्म के बजाय कोई और फिल्म देखना ज्यादा ठीक है
स्टार 1 .5

द्वारा
मनेन्द्र यादव

Friday, 23 September 2011

मौसम - फिल्म समीक्षा

आखिरकार इस हफ्ते 'मौसम' रिलीज़ हो ही गई, पहले वायु विभाग फिर रेल विभाग कि आपत्ति के चलते फिल्म कि रिलीज़ डेट को एक हफ्ते आगे सरकाया गया. फिल्म में 1992 में बाबरी मस्जिद के गिराने से पहले से लेकर अगले 10 साल तक कि कहानी को पौने तीन घंटे कि लम्बी फिल्म में दिखाया गया है, जिस तरह मौसम बदलते है उसी तरह फिल्म कि कहानी में लोकेशन पहले पंजाब, स्कॉट्लैंड, फिर पंजाब, फिर स्कॉट्लैंड और अहमदाबाद बदलती है. चूंकि राइटर और डायरेक्टर खुद पंकज कपूर है इसलिए उन्होंने अपनी फिल्म में कांटछांट की हिम्मत नहीं जुटाई. फिल्म की लम्बाई 40 -50 मिनट कम होना चाहिए थी जिससे  फिल्म थोड़ी कस जाती और दर्शक फिल्म में अधिकांशत: बोर होने से बच जाते.  वैसे भी आजकल दर्शक और मल्टीप्लेक्स मालिक ज्यादा लम्बी फ़िल्मों से बचते है.

पंजाब के एक गाँव  में रहने वाला हैरी (शाहिद कपूर) और उसी  गाँव में नई नई रहने आई आयत (सोनम) एक दूसरे को पसंद करने लगते है. लेकिन अचानक से आयत अपने परिवार के साथ गाँव छोड़कर चली जाती है, इधर हैरी एयरफोर्स में ज्वाइन करता है और स्कॉट्लैंड चला जाता है. वहां उसकी मुलाकात आयत से होती है कहानी कुछ और आगे बढती है पर अचानक से कारगिल का युद्ध शुरू होने के कारण हैरी को, आयत को बिना बताये भारत आना पड़ता है,  हैरी के युद्ध में घायल हो जाने के कारण उसका इलाज चलता है, उधर आयत हैरी को ढूढती हुई उसके गाँव जाती है, और जब कुछ पता नहीं चलता तो गाँव कि एक लड़की को हैरी के लिए एक ख़त दे जाती है, पर वो लड़की भी हैरी को चाहती थी इसलिए हैरी को ख़त नहीं देती. हैरी के शरीर का आधा हिस्सा लकवाग्रस्त हो जाता है, वो स्विट्जरलैंड में रहने वाली बहन को आयत के घर भेजता तो पता चलता है कि आयत ने स्कॉट्लैंड छोड़ दिया है. कुछ महीनो बाद हैरी स्विट्जरलैंड में आयत को अपने कजिन और उसके बच्चों के साथ देखता है तो समझता है कि उसकी शादी हो गई है और वापस अपने गाँव लौट आता है, 9 /11 की घटना के कारण आयत फिर से भारत लौटकर अहमदाबाद में रहने लगती है. इधर हैरी अहमदाबाद एक शादी में जाता है, फिर अहमदाबाद में दंगे छिड़ते है और इसी दौरान दोनों का मिलन होता है

कहानी का पंजाब वाला हिस्सा बड़ा ही खूबसूरत फिल्माया गया है, उस समय का प्यार अपने आप में शालीनता लिए होता था, अपने प्यार का इज़हार कर पाना कितना मुश्किल होता था. प्रेमियों को प्रेमिका की  झलक देखने के लिए क्या क्या नहीं करना पड़ता था. कुछ दिल को छू लेने वाले दृश्य भी लिखे गए है. कहानी जैसे ही पंजाब से बाहर निकलती है, निर्देशक का कण्ट्रोल हट जाता है और फिल्म बोझिल सी हो जाती है.

फिल्म की खूबी इसका संगीत है. गाने मधुर है खासतौर से 'रब्बा', 'इक तू ही' उम्दा है. फिल्म में ढेर सारे संयोग हैं हालाँकि निर्देशक को संयोग का उपयोग करने कि आज़ादी होती है पर एक हद से ज्यादा हो जाने से कारण फिल्म की विश्वसनीयता खो जाती है.कहानी को कुछ बड़ी घटनाओं से जोड़ने की असफल कोशिश की गई है.  शाहिद और सोनम ने अभी तक का उत्कृष्ट अभिनय किया है. पंकज कपूर लेखक से ज्यादा निर्देशक के रूप में प्रभावित करते है.

कई दृश्य दर्शकों को हज़म नहीं होंगे जैसे कि दोनों का देश विदेश में अचानक से सामने आ जाना , सेकण्ड हाफ में कई दृश्यों का दोहराब होना इत्यादि. बिना किसी कारण शाहिद का आयत को शादीशुदा समझना भी तर्कसंगत नहीं लगता .

संक्षेप में कहा जाये तो  ये फिल्म धैर्य मांगती है ,फिल्म में कई अच्छे दृश्य है पर पूरी फिल्म नहीं.
स्टार 2 /5
द्वारा
मनेन्द्र यादव

Saturday, 10 September 2011

Aarakshan Movie review

आरक्षण ------------ नाम में क्या रखा है                                                                                                          


प्रकाश झा ने हमेशा अपनी फिल्मो में सामाजिक मुद्दों को उठाया है, चाहे वो  मृत्युदंड हो, गंगाजल, अपहरण या राजनीति. सभी फिल्मों  में उनके अन्दर समाज को बदलने की सोच दिखाई देती है, इसी वजह से उन्होंने बिहार से चुनाव भी लड़ा था पर वे जीत नहीं पाए. सभी को इस फिल्म से उम्मीद थी की प्रकाश झा ने  शीर्षक के मुताबिक फिल्म में इस मुद्दे का विश्लेषण करके कुछ समाधान दिखने का प्रयास किया होगा. परन्तु उम्मीद के बाहर निर्देशक ने आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दे को केवल सतही स्तर पर छुआ है, जिसके कारण दर्शकों को निराशा हो सकती है.  


फिल्म में दिखाया गया है की शिक्षा का किस तरह से व्यवसायीकरण होता जा रहा है और ये एक बहुत बड़े मार्केट में तब्दील होती जा रही है.  पूरी फिल्म आदर्शवादी, ईमानदार  प्रिंसिपल अमिताभ बच्चन पर केन्द्रित है, जो शिक्षा को व्यापार बनाने और सभी छात्रो को सामान भाव से देखकर उनकी यथाशक्ति सहायता करते हैं.  पर कुछ भ्रष्ट लोगो के द्वारा आरक्षण के नाम पर हुई राजनीती का शिकार होकर सम्मान खोने के बाद अपना इस्तीफ़ा दे देते हैं. और परेशानियों में घिर जाते हैं. फिर किस तरह वो दुनिया की नजरो में अपना खोया हुआ सम्मान पाते है , यही इस फिल्म में कुछ नाटकीय तथा विश्वसनीय  दृश्यों के द्वारा दिखाया गया है, फिल्म की स्क्रिप्ट में कुछ कमियां हैं पर उन्हें नजर अंदाज किया जा सकता है. जैसे की सैफ और दीपिका के प्रेम प्रसंग को अधूरा छोड़ दिया गया और अमित जी को इससे बेखबर रखा गया. इतने बड़े कॉलेज का प्रिंसिपल बैंक के फॉर्म को विश्वास के कारण बिना कैसे पढ़े साइन कर देता है.  फिल्म का पहला सीन काफी प्रभावी है, जिसे देखकर पता चलता है की पूरी फिल्म इसी विषय पर आधारित होगी पर मध्यांतर के बाद फिल्म का ट्रैक बदल जाता है, आरक्षण का मुद्दा बिलकुल गायब हो जाता है  हालाँकि दूसरा हाफ पहले हाफ की अपेक्षा जरा सा कमजोर है, दृश्यों को ज्यादा खीचा गया है , परन्तु दर्शको की रूचि बनी रहती है, फिल्म के अंत को लेखक ने जल्दबाजी में समेत दिया,जो थोडा नाटकीय सा लगता है, इससे और अच्छा होने की संभावनाएं थीं.
        
फिल्म में अमित जी ने अपना  किरदार बेहतरीन तरीके से निभाया है, इस रोल को उनसे बेहतर कोई और नहीं कर सकता था.  सैफ एक दलित मेधावी युवक बने है परन्तु इंटरवल के बाद कुछ उनके पास करने के लिए ज्यादा कुछ नहीं था. दीपिका ने एक सिद्धांतवादी पिता की पुत्री की भूमिका बखूबी निभाई है, प्रतीक के अभिनय में परिपक्वता नहीं दिखती. मनोज वाजपेयी को इसी तरह के रोल करने चाहिए, प्रकाश झा के साथ कम करने से उनके अभिनय का स्टार ऊँचा उठा है. सौरभ शुक्ला, यशपाल शर्मा, मनोज तिवारी, तन्वी आजमी आदि अपने किरदार में जमे है.  प्रकाश झा ने बहुत अच्छे संवाद लिखे है.एक दृश्य के बैकग्राऊंड में वे नजर आते है.

संक्षेप में कहा जाये तो  फिल्म में आरक्षण के नाम पर शिक्षा के व्यवसायीकरण का मुद्दा दिखाया जाता है, तथा युवा छात्रों और बुद्धिजीवी दर्शकों को  पसंद आ सकती है. 
रेटिंग  2.5/5  


द्वारा
मनेन्द्र यादव ,

Mere brother ki dulhan, movie review

"मेरे ब्रदर कि दुल्हन" जैसा कि नाम से ही प्रतीत होता है कि इस फिल्म में क्या होने वाला होगा, शायद यशराज फिल्म्स ने फिल्म का शीर्षक भी इसलिए ऐसा रखा हो जिससे की लोग इस  रिश्ते के अजीब रूप के बारे में चर्चा करे या आपत्ति करे. आखिर दोनों ही स्थिति में फायदा तो फिल्म के collection को ही होना है.फिल्म की पब्लिसिटी में कोई कमी नहीं की गई, कुछ लोगो को इस बात से आपत्ति हो सकती है कि कैसे कोई अपनी होने वाली भाभी के साथ इश्क कर सकता है, अपने भाई को कैसे धोखा दे सकता है, परन्तु फिल्म देखते समय घटनाक्रम इतनी तेजी से चलते है कि ये सब बाते सोचने का वक़्त नहीं मिलता.

लव( अली अब्बास जाफ़र) और कुश(इमरान खान ) दोनों भाई है, इमरान खान अपने बड़े भाई की शादी के लिए परफेक्ट लड़की ढूढने निकलता है, इत्तफाक से उसकी मुलाकात कटरीना से होती है, जिससे वो 5 साल पहले मिला था, इन 5 सालो में कटरीना बहुत बदल जाती है और इमरान उसे अपने भाई के लिए पसंद कर लेता है. शादी कि तैयारिया शुरू हो जाती है, लन्दन से अली जाफ़र इंडिया आने वाला होता है, पर कटरीना चाहती है कि शादी से पहले 2 दिन वो खुल कर मौज मस्ती करे, और इमरान खान उसकी मौज मस्ती में उसका साथ देता है और   ज्यादातर समय कटरीना के साथ गुजारता है.  अली जाफ़र के इंडिया आने के बाद अली और कटरीना एक दुसरे के साथ समय बिताते है, पर कटरीना और इमरान को एक दुसरे के साथ बिताये पल बहुत याद आते है, उन्हें अहसास हो जाता है कि वो एक दूसरे को प्यार करने लगे है. दोनों प्लान बनाते है और ऐसी परिस्थितिया पैदा कर देते है कि सबकी मर्जी से उनकी शादी हो जाती है.

अली जाफ़र ने फिल्म का स्क्रीनप्ले भी लिखा है और निर्देशन भी किया है इसलिए पूरी फिल्म उनके कण्ट्रोल में रहती है, कहानी भटकती नहीं है, पहले हाफ में कहानी बड़ी तेजी से चलती है इंटरवल के बाद कुछ देर बाद फिर से कहानी कि स्पीड बढ़ जाती है, दर्शको के मनोरंजन का स्तर बना रहता है,  इमरान और  कटरीना के प्लान को दिलचस्प और कॉमेडी से भरा हुआ दिखाया जाता है, कटरीना द्वारा भागकर शादी करने योजना पर इमरान द्वारा पिता की इज्ज़त और होने वाली बदनामी के कारण मना करना अच्छा लगता है

परिस्थितिजन्य हास्य होने से फिल्म बहुत मनोरंजक लगती है, कटरीना का रोल प्रमुख है, जिसको उन्होंने अच्छी तरह से निभाया है, ये  बाकी सभी कलाकारों ने भी अच्छी एक्टिंग की है,  पूरी फिल्म में एक कॉमेडी टच बना रहता है, लगता नहीं की ये अली अब्बास ज़फर की पहली फिल्म है.

फिल्म के संगीत से भी फिल्म को फायदा मिला है, टाइटल सॉंग, छूमंतर, इश्क रिस्क अच्छी धुनें है जिन्हें  गुनगुनाते हुए दर्शक सिनेमा हॉल से बहार निकलेंगे.

संक्षेप में कहा जाये तो  हलके फुल्के मनोरंजन के लिए फिल्म को देखा जाना चाहिए.
3 /5

द्वारा -
मनेन्द्र यादव,  दिल्ली

Thursday, 28 July 2011

Publicity ka funda


  Publicity seeker Rakhi sawant kafi dino se charcha mein nahi aai thi. Swayamvar me shadi ke naam par rakhi ne jo janta ke samne natak kiya, uska sach jald hi "Elesh" se sagai todne ke bad samne aa gaya. Nautanki queen Rakhi ne Baba Ramdev se shadi karne ki chahat ka izhar karke fir se surkhiyon me jagah bana li hai. Jabki wo acchi tarah janti hai ki ye sambhav nahi hai, 
         Baba ramdev ek acche kam ke liye andolan kar rahe hai, unki vajah se sarkar ka asli chehra janta ko dekhne ko mila. Baba Ramdev ne jo andolan shuru kiya hai usme ve aaj nahi to kal safal ho hi jayenge kyoki baba ke sath pura desh videshi kaledhan ko vapas lane ki mang kar raha hai. Agar aisa ho gaya to desh ki tarvir to badal hi jayegi sath mein Baba Ramdev ke bhi kisi mahatvpurn pad par aaseen hone ki sambhavnao ko bal milega. 
        Rakhi ki mansha ka andaja isi bat se lagaya ja sakta hai ki jo rakhi sawant ne swayamvar mein aye hazaro profile mein se kuchh darjan bhar select karne ke bad, un darjano ladko ko kai hafte tak har tarike se thok peet kar dekhne ke bad bhi shadi karne ki bat se mukar gai, jabki baba se to wo mili bhi nahi hai. kuchh samay pahle Rahul gandhi se shadi karne ka khwab dekhne wali rakhi ne ye kahkar bat badal di ki, Soniya gandhi ke samne unki dal nahi galegi.
        Aaj kal kai nai models bhi publicity ke liye rakhi ke bataye raste par chal rahi hai jaise 'Punam Pandey'. usne bhi team india ke world cup jeetne ke bad nude hone ka wada kiya. isse use bahut fayda hua baithe bithaye ek reality show "khatro ke khiladi" mil gaya. socha tha na team world cup jeetegi aur na hi nude hona padega. Par shukra hai ki team ki mehnat se world cup humara hua. uske bad punam ka bahana ki BCCI permission nahi de raha. to madam wada karne se pahle kiski permission li thi apne. 

      Har ul julul bayan se publicity to ho jati hai par uske bad jo khilli udti hai wo jhelna aam sharif logo ke bas ki bat nahi. Iske liye rakhi jaisa jigar hona chahiye.