Friday, 3 February 2012

Gali gali chor hai- Movie Review


वर्ष 2011  की सबसे ज्यादा चर्चित घटनाओं में से एक थी अन्ना का भष्टाचार के खिलाफ आन्दोलन. यूं तो आम आदमी और भ्रष्टाचार के ऊपर काफी फ़िल्में आ चुकी है पर ये सबसे सही समय था इस फिल्म को रिलीज़ करने का . लेखक तथा निर्देशक रूमी जाफरी ने कई सफल फिल्मों जैसे 'गोलमाल रिटर्न्स', 'मुझसे शादी करोगी', 'मैंने प्यार क्यूँ किया' , ' चलते चलते' आदि के संवाद और स्क्रीनप्ले लिखा है और कई फिल्मों का निर्देशन भी किया है. अब हाजिर है हास्य तथा ड्रामे में रची बसी फिल्म " गली गली में चोर है " के साथ. 
फिल्म ' गली गली में चोर है ' कहानी है कि भष्टाचार किस तरह एक आम आदमी की जिंदगी को प्रभावित करता है,  भोपाल में रहने वाला भारत (अक्षय खन्ना ) एक बैंक में कैशियर की नौकरी करता है.जो कि एक शरीफ और सिद्धांतवादी आदमी है, उसके साथ उसकी पत्नी निशा (श्रिया सरन) और उसके पिता शिवनारायण (सतीश कौशिक ) रहते है.शिवनारायण के आदर्शवादी इन्सान है जो भष्टाचार मुक्त देश का सपना देखते है, पत्नी निशा भी हर भारतीय पत्नी कि तरह वो भी अपने पति भारत को बैंक का मेनेजर बनते देखना चाहती है,  भारत एक पार्ट टाइम एक्टर भी है जो कि रामलीला में हनुमान का किरदार निभाता है, पर रामलीला में भगवान राम का किरदार निभाना भारत के कई सपनो में से एक है. पर अभी तक राम का किरदार सत्तू त्रिपाठी (अमित मिस्त्री) ही कर रहा है, जो कि एक बेकार एक्टर है, पर उस इलाके के MLA मन्तु त्रिपाठी का छोटा भाई है.  
चुनाव के दौरान मन्तु त्रिपाठी , चुनाव कार्यालय खोलने के लिए भारत के घर में एक कमरे की मांग करता है, पर  पत्नी निशा के असहमत होने के कारण भारत, MLA को मना कर देता है. उनके घर में ख़ूबसूरत लड़की अमिता (मुग्धा गोडसे ) एक पेईंग गेस्ट के रूप में रहती है, जो कि कॉल सेंटर में काम करती है, इधर दोनों त्रिपाठी भाई , भारत से बदला लेने का मौका ढूढ़ते है, तथा कांस्टेबल परशुराम कुशवाहा (अन्नू कपूर) की मदद से भारत तथा उसके पिता को टेबल फैन चुराने के एक झूठे केस में फंसा देते है, इस आफत से बचने के लिए भारत क्या  क्या करता है, ये हास्य में लपेट कर दिखाया जाता है. 
मोमोक्षु मुदगल की कहानी अच्छी है पर जिस तरह के घटना उन्होंने पेश की वो फिल्म नहीं टीवी सीरियल के स्तर की लगती है, बेशक ये कहानी आज़ाद भारत के आम आदमी की कहानी है, पर जहा हर युवा धीरुभाई अम्बानी से प्रेरित है, वहां पर युवा देश के भ्रष्टाचार के बारे में कहा सोचते है, अगर कुछ सोचते भी है, तो फिल्म की घटनाये उन्हें ऐसा करने के लिए प्रेरित नहीं करती.फिल्म को जल्दबाजी में समेटा गया है. फिल्म के कुछ सीन दिलचस्प है जैसे टेबल फैन को ठिकाने लगाने वाले सीन, चोर , हवलदार और गवाह वाले सीन. बीच बीच में कुछ बोरियत भी दर्शकों को झेलनी पड़ती है, चुन्नू फ़रिश्ता (विजयराज ), बच्चू गुलकंद , पानवाला जैसे कुछ दिलचस्प किरदार भी आते है. वीना मालिक के आइटम सॉन्ग 'छन्नो' को रखने का कोई उचिंत कारण नजर नहीं आता.

अक्षय खन्ना ने आम आदमी का किरदार बहुत अच्छी तरह पेश किया है, आम आदमी की मजबूरी, लाचारी और गुस्से को अच्छी तरह दिखाया है, श्रिया सरन और मुग्धा गोडसे के लिए करने लायक ज्यादा कुछ नहीं था. मुग्धा वाला  ट्रैक सही से नहीं लिखा गया. सतीश कौशिक प्रभावित करते है, फिल्म में सबसे बेहतरीन रोल अन्नू कपूर ने भ्रस्त पुलिस वाले  निभाया है. इनके अलावा अखिलेन्द्र मिश्र, विजयराज , अमित मिस्त्री अपना अपना असर छोड़ने में कामयाब रहे. 
फिल्म का सबसे बड़ी खूबी इसकी कास्टिंग है, सभी मंजे हुए कलाकार होने से फिल्म देखने में मजा आता है, फिल्म के संवाद अच्छे है, और सबसे बड़ी खामी है कि फिल्म के क्लाइमेक्स को सही से नहीं लिखा गया . 
और संक्षेप में कहा जा सकता है, कि  अच्छे कलाकारों तथा अच्छे उद्देश्य के कारण एक बार देखा जाना चाहिए.
स्टार 2 .5 / 5 

द्वारा 
मनेन्द्र यादव 

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