Friday, 10 February 2012

एक मैं और एक तू- movie review



'एक मैं और एक तू ' करन जौहर के धर्मा प्रोडक्शन और यू टीवी मोशन पिक्चर के बैनर तले बनी एक रोमांटिक फिल्म है जिसे शकुन बत्रा ने लिखा तथा निर्देशित किया है, पहले ये फिल्म 7 अक्टूबर 11 को रिलीज होने वाली थी, पर किसी कारण से इसे लेट करके वेलेंटाइन डे के सप्ताह पर प्रदर्शित किया जा रहा है. ये सप्ताह वैसे ही युवायों तथा उनकी मोहब्बत के नाम होता है, शायद इसलिए वेलेंटाइन डे का फायदा लेने के लिए इस हफ्ते रोमांटिक फिल्म को रोक कर रखा गया था.

इस फिल्म में राहुल कपूर (इमरान खान) , जो कि लॉस वेगास में रहता है, की अचानक जॉब चली जाती है, इस बात को घर वालो से छुपाकर रखता है, उसकी मुलाकात होती है रिहाना ब्रिगेंजा (करीना कपूर ) से. क्रिसमस की पहली रात को दोनों काफी शराब पी लेते है और नशे में वेडिंग चेपल जाकर शादी कर लेते है, जब अगली सुबह दोनों को होश आता है, तब उन्हें पता चलता है. अब उनके पास एक तो जॉब खोने का दुःख है और ऊपर से अचानक से  हुई शादी. दोनों जल्द से जल्द शादी तोड़ने का फैसला करते है. पर इस कार्यवाई में कुछ दिन लगते है, और इन दिनों में नायक और नायिका एक दूसरे को पसंद करने लगते है.
फिल्म का कांसेप्ट नया है, पर भारतीय दर्शक  जिनके लिए शादी का रिश्ता बहुत पवित्र माना जाता है, वहा पर पार्टी में मौज मस्ती करते हुए, बिना होशो खबर के शादी होने की घटना, जिस पर पूरी फिल्म आधारित है, को किस नज़रिए से देखेंगे, ये काबिले गौर है.  इस समय करीना कपूर का करीअर अपने शीर्ष पर है, चोटी के सभी खान कलाकारों के साथ वह काम कर रही है. शकुन बत्रा ने फिल्म का निर्देशन अच्छे तरीके से किया है. नायक और नायिका आज के ज़माने के लॉस वेगास में रहने वाले युवा है . फिल्म में इमरान एक इसे युवा बने है जो हर काम बच्चे की तरह अपने घरवालो से पूछ  पूछ  कर करते है. आज के ज़माने में लॉस वेगास में रहने वाला कोई 25 साल का युवा इस तरह कर सकता है, इसमें शक होता है. और दूसरी तरफ करीना कपूर का किरदार लगभग 'जब वी मेट' जैसा ही है. जिन्दगी के हर पर को इंजॉय करना उसकी आदत है. जब ये दोनों मिलते है. तो कुछ मनोरंजक से घटना क्रम होते है, जो दर्शकों को बांधे रखते है जो कि निर्देशन का कमाल है. सेकंड हाफ में फिल्म मुंबई शिफ्ट हो जाती है. कुछ सीन काबिले तारीफ है जैसे डाइनिंग टेबल के सीन. ये साधारण सी कहानी मनोरंजक अपने अच्छे अभिनय और मनोरंजक प्रस्तुतीकरण के कारण दर्शकों को पसंद आ सकती है.
फिल्म में करीना ने बेहतरीन अभिनय किया है, इमरान भी प्रभावित करते है, राम कपूर , रत्ना पाठक शाह और बोमन ईरानी ने भी अच्छा अभिनय किया है. अमित त्रिवेदी द्वारा दिया गया फिल्म का संगीत औसत रहा है. टाइटल सॉन्ग लोकप्रिय हो चुका है. इसके अलावा सारे गाने ठीक ठाक से है.
और संक्षेप में कहना चाहिए कि युवाओं को वेलेंटाइन वीक पर इस रोमांटिक मूवी को देखना चाहिए. 
स्टार 3 / 5
मनेन्द्र यादव

Friday, 3 February 2012

Gali gali chor hai- Movie Review


वर्ष 2011  की सबसे ज्यादा चर्चित घटनाओं में से एक थी अन्ना का भष्टाचार के खिलाफ आन्दोलन. यूं तो आम आदमी और भ्रष्टाचार के ऊपर काफी फ़िल्में आ चुकी है पर ये सबसे सही समय था इस फिल्म को रिलीज़ करने का . लेखक तथा निर्देशक रूमी जाफरी ने कई सफल फिल्मों जैसे 'गोलमाल रिटर्न्स', 'मुझसे शादी करोगी', 'मैंने प्यार क्यूँ किया' , ' चलते चलते' आदि के संवाद और स्क्रीनप्ले लिखा है और कई फिल्मों का निर्देशन भी किया है. अब हाजिर है हास्य तथा ड्रामे में रची बसी फिल्म " गली गली में चोर है " के साथ. 
फिल्म ' गली गली में चोर है ' कहानी है कि भष्टाचार किस तरह एक आम आदमी की जिंदगी को प्रभावित करता है,  भोपाल में रहने वाला भारत (अक्षय खन्ना ) एक बैंक में कैशियर की नौकरी करता है.जो कि एक शरीफ और सिद्धांतवादी आदमी है, उसके साथ उसकी पत्नी निशा (श्रिया सरन) और उसके पिता शिवनारायण (सतीश कौशिक ) रहते है.शिवनारायण के आदर्शवादी इन्सान है जो भष्टाचार मुक्त देश का सपना देखते है, पत्नी निशा भी हर भारतीय पत्नी कि तरह वो भी अपने पति भारत को बैंक का मेनेजर बनते देखना चाहती है,  भारत एक पार्ट टाइम एक्टर भी है जो कि रामलीला में हनुमान का किरदार निभाता है, पर रामलीला में भगवान राम का किरदार निभाना भारत के कई सपनो में से एक है. पर अभी तक राम का किरदार सत्तू त्रिपाठी (अमित मिस्त्री) ही कर रहा है, जो कि एक बेकार एक्टर है, पर उस इलाके के MLA मन्तु त्रिपाठी का छोटा भाई है.  
चुनाव के दौरान मन्तु त्रिपाठी , चुनाव कार्यालय खोलने के लिए भारत के घर में एक कमरे की मांग करता है, पर  पत्नी निशा के असहमत होने के कारण भारत, MLA को मना कर देता है. उनके घर में ख़ूबसूरत लड़की अमिता (मुग्धा गोडसे ) एक पेईंग गेस्ट के रूप में रहती है, जो कि कॉल सेंटर में काम करती है, इधर दोनों त्रिपाठी भाई , भारत से बदला लेने का मौका ढूढ़ते है, तथा कांस्टेबल परशुराम कुशवाहा (अन्नू कपूर) की मदद से भारत तथा उसके पिता को टेबल फैन चुराने के एक झूठे केस में फंसा देते है, इस आफत से बचने के लिए भारत क्या  क्या करता है, ये हास्य में लपेट कर दिखाया जाता है. 
मोमोक्षु मुदगल की कहानी अच्छी है पर जिस तरह के घटना उन्होंने पेश की वो फिल्म नहीं टीवी सीरियल के स्तर की लगती है, बेशक ये कहानी आज़ाद भारत के आम आदमी की कहानी है, पर जहा हर युवा धीरुभाई अम्बानी से प्रेरित है, वहां पर युवा देश के भ्रष्टाचार के बारे में कहा सोचते है, अगर कुछ सोचते भी है, तो फिल्म की घटनाये उन्हें ऐसा करने के लिए प्रेरित नहीं करती.फिल्म को जल्दबाजी में समेटा गया है. फिल्म के कुछ सीन दिलचस्प है जैसे टेबल फैन को ठिकाने लगाने वाले सीन, चोर , हवलदार और गवाह वाले सीन. बीच बीच में कुछ बोरियत भी दर्शकों को झेलनी पड़ती है, चुन्नू फ़रिश्ता (विजयराज ), बच्चू गुलकंद , पानवाला जैसे कुछ दिलचस्प किरदार भी आते है. वीना मालिक के आइटम सॉन्ग 'छन्नो' को रखने का कोई उचिंत कारण नजर नहीं आता.

अक्षय खन्ना ने आम आदमी का किरदार बहुत अच्छी तरह पेश किया है, आम आदमी की मजबूरी, लाचारी और गुस्से को अच्छी तरह दिखाया है, श्रिया सरन और मुग्धा गोडसे के लिए करने लायक ज्यादा कुछ नहीं था. मुग्धा वाला  ट्रैक सही से नहीं लिखा गया. सतीश कौशिक प्रभावित करते है, फिल्म में सबसे बेहतरीन रोल अन्नू कपूर ने भ्रस्त पुलिस वाले  निभाया है. इनके अलावा अखिलेन्द्र मिश्र, विजयराज , अमित मिस्त्री अपना अपना असर छोड़ने में कामयाब रहे. 
फिल्म का सबसे बड़ी खूबी इसकी कास्टिंग है, सभी मंजे हुए कलाकार होने से फिल्म देखने में मजा आता है, फिल्म के संवाद अच्छे है, और सबसे बड़ी खामी है कि फिल्म के क्लाइमेक्स को सही से नहीं लिखा गया . 
और संक्षेप में कहा जा सकता है, कि  अच्छे कलाकारों तथा अच्छे उद्देश्य के कारण एक बार देखा जाना चाहिए.
स्टार 2 .5 / 5 

द्वारा 
मनेन्द्र यादव 

Friday, 27 January 2012

Agneepath - Movie Review

इन दिनों दर्शकों कि रूचि में खासा परिवर्तन देखने को मिल रहा है, उन फिल्मों को पसंद किया जा रहा है जो 80 - 90 के दशकों में पसंद की जाती थी, जिसमे फिल्म का नायक लार्जर देन लाइफ होता था, जो अपने माता या पिता की मौत का बदला लेने के लिए, खूंखार विलेन से भिड़ता था. इन फिल्मों में दर्शकों को शुरू में ही पता चल जाता था कि फिल्म के अंत में क्या होगा, पर रूचि ये देखने में रहती थी कि कैसे होगा.

1990  में मुकुल एस आनंद द्वारा निर्देशित फिल्म अग्निपथ आई थी, इस फिल्म में महानायक अमिताभ बच्चन ने अपनी आवाज बदल कर संवाद बोले थे, जो की दर्शकों की समझ में नहीं आये थे. उस फिल्म के फ्लॉप होने का यही कारण माना गया. कुछ समय बाद अमिताभ ने अपनी मूल आवाज में दोबारा डबिंग करके जब टीवी पर दिखाया गया तो फिल्म को काफी सराहा गया.
फिल्म शुरू होती है 1977 में महाराष्ट्र के एक गाँव मंडवा से , जहा एक आदर्शवादी, स्वाभिमानी मास्टर दीनानाथ चौहान , जो हमेशा गाँव के भले के लिए काम करता है, दीनानाथ चौहान की बढती हुई इज्ज़त उसी गाँव के कांचा (संजय दत्त )की आँखों में चुभने लगती है, कांचा गाँव वालों की ज़मीन हडपने का प्लान बनाता है, जिसमे दीनानाथ रुकावट  बनता है,  इसलिए कांचा एक षड़यंत्र में दीनानाथ को फंसाकर, गांववालों के सामने मारकर  बरगद के पेड़ पर लटका देता है, ये सब कुछ दीनानाथ  के बेटे विजय (मास्टर आरीश ) और उसकी माँ (जरीना बहाव ) के सामने होता है, इस घटना के बाद विजय की माँ विजय को लेकर मुंबई आ जाती है, और एक बच्ची को जन्म देती है, लेकिन विजय (ऋतिक ) की आँखों में कांचा से बदला लेने का सपना पलता रहता है, जिसके लिए वो मुंबई के गैंगस्टर रउफ लाला (ऋषि कपूर ) के गैंग  में शामिल होकर उसका खास बन जाता है, और कुछ उतार चढाव के बाद अंत में कांचा से बदला लेने में कामयाब होता है,
फिल्म की गति शुरू में खासी तेज रहती है, पर इंटरवल तक आते आते थोड़ी धीमी हो जाती है, पर दर्शकों की रूचि बनी रहती है, फिल्म में बाल विजय का किरदार अच्छे तरीके से स्थापित किया गया है, और खासतौर से संजय दत्त का. फिल्म में संजय बहुत ही डरावने और भयानक लगते है. मूल फिल्म से इस फिल्म में थोडा बदलाब देखने को मिलता है, जैसे की मूल फिल्म विजय (अमिताभ ) का लुक दर्शकों को बहुत पसंद आया था उनके द्वारा पहना हुआ सफ़ेद सूट, आँखों में सुरमा, मुह में पान , बार बार अपना परिचय देना और अजीब तरीके से बैठना, या सब इस फिल्म में गायब  है, मूल फिल्म में अमिताभ के संवाद और उनका अभिनय पूरी फिल्म की जान था. पर इस फिल्म में ऋतिक को बहुत कम बोलने का मौका मिला है, ये बात दर्शकों को खटक सकती है. 
ऋतिक रोशन ने उम्दा अभिनय किया है पर उनके किरदार को मूल फिल्म की तरह न पेश करना थोडा अखर
सकता है, प्रियंका चोपड़ा  के लिए कुछ करने के लिए नहीं था. संजय दत्त इस फिल्म की जान है, उनका ये किरदार सालों तक याद रखा जा सकने वाला है, उनके लुक बॉडी लेंग्वेज , संवाद सभी प्रभावित करते है, कह सकते है की ये फिल्म खलनायक प्रधान फिल्म है,  फिल्म के अन्य किरदार जैसे गायतोंडे (ओमपुरी ), सूर्या,   शांताराम शिक्षा आदि को अच्छी तरह निर्देशक ने पेश किया है, ऋषि कपूर का अभिनय बेहतरीन है, फिल्म के कुछ संवाद बहुत चुटीले है, जैसे की " कमजोर कभी ये नहीं कह सकता की उसने पहलवान को माफ़ किया, उसके लिए उसका पहलवान बनना जरुरी है, ऋषि कपूर का संजय दत्त को कहना " मैंने बदसूरत चेहरे बहुत देखे है पर तेरे चेहरे से घिन टपकती है, "
क्लाइमेक्स में फिल्म का फिल्मांकन अच्छा किया गया है, फिल्म का स्क्रीनप्ले कसा हुआ है, जो कि फिल्म को दर्शकों तक जोड़ता है, निर्देशक कारण मल्होत्रा ने फिल्म पर अच्छी पकड़ बनाई है, फिल्म के गाने " देवा", " गुनगुना" और "चिकनी चमेली " पसंद किये जा रहे है, " चिकनी चमेली " गाने को सही जगह पर रखा गया है, फिल्म कि लोकेशन और सिनेमेटोग्राफी बढ़िया है, 
और अंत में 'अग्निपथ " कोई अलग तरह कि फिल्म नहीं है, पर अच्छे अभिनय , स्क्रीनप्ले और बीते दौर कि ड्रामा फिल्मों को याद करने के लिए एक बार देखा जा सकता है, 
रेटिंग  3/5

द्वारा 
मनेन्द्र यादव 


Friday, 6 January 2012

Players- Movie Review

निर्देशक द्वय अब्बास मस्तान बोलीवुड में बेहतरीन थ्रिलर फिल्मों के लिए जाने जाते है, ' खिलाडी', 'बाजीगर' , 'हमराज', 'दरार', ' एतराज ', ' रेस' आदि उनकी द्वारा निर्देशित फ़िल्में है, अपनी फिल्मों में वे होलीवुड की फिल्मों का विशुद्ध भारतीयकरण कर देते है, पर इस बार उन्होंने होलीवुड की 1969 में बनी फिल्म ' द इटालियन जॉब' के हिंदी रीमेक के अधिकार खरीद कर ' प्लेयर्स ' बनाई है,

चार्ली (अभिषेक बच्चन ),  रशिया से रोमानिया भेजे जा रहे 10 हज़ार करोड़ रूपये के सोने को चुराने का प्लान बनाता है, पर ये बहुत ही मुश्किल काम है जिसको चार्ली अकेला नहीं कर सकता इसलिए उसको कुछ साथियों की जरुरत पड़ती है, जिसके लिए उसका गुरु विक्टर दादा (विनोद खन्ना)  उसके लिए एक टीम बनाने में मदद करता है,  जिसमे ब्लास्ट एक्सपर्ट बिलाल (सिकंदर खेर ), जादूगर रोनी (बोबी देओल), स्पाइडर (नील नितिन मुकेश), रिया (विपाशा बासु ), नैना (सोनम ) और मेकअप एक्सपर्ट सनी (ओमी वैद्य) है, पूरी टीम इस चोरी को वारदात को अंजाम देती  है, चोरी के बाद कोई एक सदस्य गद्दारी करता है, उस गद्दार से बाकी के सदस्य सोना वापस लाने में कामयाब होते है. ये घटनाक्रम बहुत से छोटे छोटे घटनाओं को जन्म देते है, जो की फिल्म को दिलचस्प बनाते है,

फिल्म के स्क्रीनप्ले में कुछ दृश्य ऐसे रखे गए है, जो की ओरिजिनल फिल्म में नहीं थे, जिनकी वजह से दर्शकों को थोड़ी बोरियत हो सकती है,कहानी बेहतरीन है पर , फिल्म का स्क्रीनप्ले में कई खामियां है, लगता है, कि जुगराज ने बेमन से स्क्रीनप्ले लिखा है,  प्रीतम का  संगीत अच्छा है, तथा लोकप्रिय हो चुका है, फिल्म में स्टाइल और लोकेशन होलीवुड स्तर की है, बीच में कुछ जगह पर फिल्म बोझिल हो जाती है, पर ट्रेन से  चोरी का सीन बहुत ही खूबसूरत फिल्माया गया है, फिल्म के एडिटर का काम भी बहुत मुश्किल रहा होगा. काफी मेहनत करनी पड़ी होगी,

अभिषेक बच्चन ने इस फिल्म में 'धूम ', 'धूम-2 ", ब्लफमास्टर', 'दस', और ' दम मारो दम ' के जैसा ही स्टाइलिश रोल किया है, कई जगह बहुत प्रभावी नजर आते है, , बोबी देओल का किरदार ठीक से नहीं लिखा गया,उनके कुछ सीन जबरदस्ती घुसाए हुए लगते है,  सोनम और सिकंदर ने निराश किया, बिपाशा का अभिनय अच्छा है और उनकी खूबसूरती का फिल्म में सही उपयोग किया गया है, नील मुकेश का काम प्रभावी है, ओमी वैद्य ने कुछ जगह दर्शकों को हंसाया. विनोद खन्ना के करने के लिए कुछ नहीं था. 

और अंत में कहना चाहिए कि ये  फिल्म अब्बास मस्तान की पिछली फिल्मों से उन्नीस है, पर स्टाइलिश प्रस्तुतीकरण और रोचक कहानी की वजह से एक बार देखी जा सकती है.
स्टार 2 /5
मनेन्द्र यादव