आखिरकार इस हफ्ते 'मौसम' रिलीज़ हो ही गई, पहले वायु विभाग फिर रेल विभाग कि आपत्ति के चलते फिल्म कि रिलीज़ डेट को एक हफ्ते आगे सरकाया गया. फिल्म में 1992 में बाबरी मस्जिद के गिराने से पहले से लेकर अगले 10 साल तक कि कहानी को पौने तीन घंटे कि लम्बी फिल्म में दिखाया गया है, जिस तरह मौसम बदलते है उसी तरह फिल्म कि कहानी में लोकेशन पहले पंजाब, स्कॉट्लैंड, फिर पंजाब, फिर स्कॉट्लैंड और अहमदाबाद बदलती है. चूंकि राइटर और डायरेक्टर खुद पंकज कपूर है इसलिए उन्होंने अपनी फिल्म में कांटछांट की हिम्मत नहीं जुटाई. फिल्म की लम्बाई 40 -50 मिनट कम होना चाहिए थी जिससे फिल्म थोड़ी कस जाती और दर्शक फिल्म में अधिकांशत: बोर होने से बच जाते. वैसे भी आजकल दर्शक और मल्टीप्लेक्स मालिक ज्यादा लम्बी फ़िल्मों से बचते है.
पंजाब के एक गाँव में रहने वाला हैरी (शाहिद कपूर) और उसी गाँव में नई नई रहने आई आयत (सोनम) एक दूसरे को पसंद करने लगते है. लेकिन अचानक से आयत अपने परिवार के साथ गाँव छोड़कर चली जाती है, इधर हैरी एयरफोर्स में ज्वाइन करता है और स्कॉट्लैंड चला जाता है. वहां उसकी मुलाकात आयत से होती है कहानी कुछ और आगे बढती है पर अचानक से कारगिल का युद्ध शुरू होने के कारण हैरी को, आयत को बिना बताये भारत आना पड़ता है, हैरी के युद्ध में घायल हो जाने के कारण उसका इलाज चलता है, उधर आयत हैरी को ढूढती हुई उसके गाँव जाती है, और जब कुछ पता नहीं चलता तो गाँव कि एक लड़की को हैरी के लिए एक ख़त दे जाती है, पर वो लड़की भी हैरी को चाहती थी इसलिए हैरी को ख़त नहीं देती. हैरी के शरीर का आधा हिस्सा लकवाग्रस्त हो जाता है, वो स्विट्जरलैंड में रहने वाली बहन को आयत के घर भेजता तो पता चलता है कि आयत ने स्कॉट्लैंड छोड़ दिया है. कुछ महीनो बाद हैरी स्विट्जरलैंड में आयत को अपने कजिन और उसके बच्चों के साथ देखता है तो समझता है कि उसकी शादी हो गई है और वापस अपने गाँव लौट आता है, 9 /11 की घटना के कारण आयत फिर से भारत लौटकर अहमदाबाद में रहने लगती है. इधर हैरी अहमदाबाद एक शादी में जाता है, फिर अहमदाबाद में दंगे छिड़ते है और इसी दौरान दोनों का मिलन होता है
कहानी का पंजाब वाला हिस्सा बड़ा ही खूबसूरत फिल्माया गया है, उस समय का प्यार अपने आप में शालीनता लिए होता था, अपने प्यार का इज़हार कर पाना कितना मुश्किल होता था. प्रेमियों को प्रेमिका की झलक देखने के लिए क्या क्या नहीं करना पड़ता था. कुछ दिल को छू लेने वाले दृश्य भी लिखे गए है. कहानी जैसे ही पंजाब से बाहर निकलती है, निर्देशक का कण्ट्रोल हट जाता है और फिल्म बोझिल सी हो जाती है.
फिल्म की खूबी इसका संगीत है. गाने मधुर है खासतौर से 'रब्बा', 'इक तू ही' उम्दा है. फिल्म में ढेर सारे संयोग हैं हालाँकि निर्देशक को संयोग का उपयोग करने कि आज़ादी होती है पर एक हद से ज्यादा हो जाने से कारण फिल्म की विश्वसनीयता खो जाती है.कहानी को कुछ बड़ी घटनाओं से जोड़ने की असफल कोशिश की गई है. शाहिद और सोनम ने अभी तक का उत्कृष्ट अभिनय किया है. पंकज कपूर लेखक से ज्यादा निर्देशक के रूप में प्रभावित करते है.
कई दृश्य दर्शकों को हज़म नहीं होंगे जैसे कि दोनों का देश विदेश में अचानक से सामने आ जाना , सेकण्ड हाफ में कई दृश्यों का दोहराब होना इत्यादि. बिना किसी कारण शाहिद का आयत को शादीशुदा समझना भी तर्कसंगत नहीं लगता .
संक्षेप में कहा जाये तो ये फिल्म धैर्य मांगती है ,फिल्म में कई अच्छे दृश्य है पर पूरी फिल्म नहीं.
स्टार 2 /5 द्वारा
मनेन्द्र यादव

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