आरक्षण ------------ नाम में क्या रखा है
द्वारा
मनेन्द्र यादव ,
प्रकाश झा ने हमेशा अपनी फिल्मो में सामाजिक मुद्दों को उठाया है, चाहे वो मृत्युदंड हो, गंगाजल, अपहरण या राजनीति. सभी फिल्मों में उनके अन्दर समाज को बदलने की सोच दिखाई देती है, इसी वजह से उन्होंने बिहार से चुनाव भी लड़ा था पर वे जीत नहीं पाए. सभी को इस फिल्म से उम्मीद थी की प्रकाश झा ने शीर्षक के मुताबिक फिल्म में इस मुद्दे का विश्लेषण करके कुछ समाधान दिखने का प्रयास किया होगा. परन्तु उम्मीद के बाहर निर्देशक ने आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दे को केवल सतही स्तर पर छुआ है, जिसके कारण दर्शकों को निराशा हो सकती है.
फिल्म में दिखाया गया है की शिक्षा का किस तरह से व्यवसायीकरण होता जा रहा है और ये एक बहुत बड़े मार्केट में तब्दील होती जा रही है. पूरी फिल्म आदर्शवादी, ईमानदार प्रिंसिपल अमिताभ बच्चन पर केन्द्रित है, जो शिक्षा को व्यापार बनाने और सभी छात्रो को सामान भाव से देखकर उनकी यथाशक्ति सहायता करते हैं. पर कुछ भ्रष्ट लोगो के द्वारा आरक्षण के नाम पर हुई राजनीती का शिकार होकर सम्मान खोने के बाद अपना इस्तीफ़ा दे देते हैं. और परेशानियों में घिर जाते हैं. फिर किस तरह वो दुनिया की नजरो में अपना खोया हुआ सम्मान पाते है , यही इस फिल्म में कुछ नाटकीय तथा विश्वसनीय दृश्यों के द्वारा दिखाया गया है, फिल्म की स्क्रिप्ट में कुछ कमियां हैं पर उन्हें नजर अंदाज किया जा सकता है. जैसे की सैफ और दीपिका के प्रेम प्रसंग को अधूरा छोड़ दिया गया और अमित जी को इससे बेखबर रखा गया. इतने बड़े कॉलेज का प्रिंसिपल बैंक के फॉर्म को विश्वास के कारण बिना कैसे पढ़े साइन कर देता है. फिल्म का पहला सीन काफी प्रभावी है, जिसे देखकर पता चलता है की पूरी फिल्म इसी विषय पर आधारित होगी पर मध्यांतर के बाद फिल्म का ट्रैक बदल जाता है, आरक्षण का मुद्दा बिलकुल गायब हो जाता है हालाँकि दूसरा हाफ पहले हाफ की अपेक्षा जरा सा कमजोर है, दृश्यों को ज्यादा खीचा गया है , परन्तु दर्शको की रूचि बनी रहती है, फिल्म के अंत को लेखक ने जल्दबाजी में समेत दिया,जो थोडा नाटकीय सा लगता है, इससे और अच्छा होने की संभावनाएं थीं.
फिल्म में अमित जी ने अपना किरदार बेहतरीन तरीके से निभाया है, इस रोल को उनसे बेहतर कोई और नहीं कर सकता था. सैफ एक दलित मेधावी युवक बने है परन्तु इंटरवल के बाद कुछ उनके पास करने के लिए ज्यादा कुछ नहीं था. दीपिका ने एक सिद्धांतवादी पिता की पुत्री की भूमिका बखूबी निभाई है, प्रतीक के अभिनय में परिपक्वता नहीं दिखती. मनोज वाजपेयी को इसी तरह के रोल करने चाहिए, प्रकाश झा के साथ कम करने से उनके अभिनय का स्टार ऊँचा उठा है. सौरभ शुक्ला, यशपाल शर्मा, मनोज तिवारी, तन्वी आजमी आदि अपने किरदार में जमे है. प्रकाश झा ने बहुत अच्छे संवाद लिखे है.एक दृश्य के बैकग्राऊंड में वे नजर आते है.
संक्षेप में कहा जाये तो फिल्म में आरक्षण के नाम पर शिक्षा के व्यवसायीकरण का मुद्दा दिखाया जाता है, तथा युवा छात्रों और बुद्धिजीवी दर्शकों को पसंद आ सकती है.
रेटिंग 2.5/5 द्वारा
मनेन्द्र यादव ,

very nice movie.
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