इन दिनों दर्शकों कि रूचि में खासा परिवर्तन देखने को मिल रहा है, उन फिल्मों को पसंद किया जा रहा है जो 80 - 90 के दशकों में पसंद की जाती थी, जिसमे फिल्म का नायक लार्जर देन लाइफ होता था, जो अपने माता या पिता की मौत का बदला लेने के लिए, खूंखार विलेन से भिड़ता था. इन फिल्मों में दर्शकों को शुरू में ही पता चल जाता था कि फिल्म के अंत में क्या होगा, पर रूचि ये देखने में रहती थी कि कैसे होगा.
1990 में मुकुल एस आनंद द्वारा निर्देशित फिल्म अग्निपथ आई थी, इस फिल्म में महानायक अमिताभ बच्चन ने अपनी आवाज बदल कर संवाद बोले थे, जो की दर्शकों की समझ में नहीं आये थे. उस फिल्म के फ्लॉप होने का यही कारण माना गया. कुछ समय बाद अमिताभ ने अपनी मूल आवाज में दोबारा डबिंग करके जब टीवी पर दिखाया गया तो फिल्म को काफी सराहा गया.
फिल्म शुरू होती है 1977 में महाराष्ट्र के एक गाँव मंडवा से , जहा एक आदर्शवादी, स्वाभिमानी मास्टर दीनानाथ चौहान , जो हमेशा गाँव के भले के लिए काम करता है, दीनानाथ चौहान की बढती हुई इज्ज़त उसी गाँव के कांचा (संजय दत्त )की आँखों में चुभने लगती है, कांचा गाँव वालों की ज़मीन हडपने का प्लान बनाता है, जिसमे दीनानाथ रुकावट बनता है, इसलिए कांचा एक षड़यंत्र में दीनानाथ को फंसाकर, गांववालों के सामने मारकर बरगद के पेड़ पर लटका देता है, ये सब कुछ दीनानाथ के बेटे विजय (मास्टर आरीश ) और उसकी माँ (जरीना बहाव ) के सामने होता है, इस घटना के बाद विजय की माँ विजय को लेकर मुंबई आ जाती है, और एक बच्ची को जन्म देती है, लेकिन विजय (ऋतिक ) की आँखों में कांचा से बदला लेने का सपना पलता रहता है, जिसके लिए वो मुंबई के गैंगस्टर रउफ लाला (ऋषि कपूर ) के गैंग में शामिल होकर उसका खास बन जाता है, और कुछ उतार चढाव के बाद अंत में कांचा से बदला लेने में कामयाब होता है,
फिल्म की गति शुरू में खासी तेज रहती है, पर इंटरवल तक आते आते थोड़ी धीमी हो जाती है, पर दर्शकों की रूचि बनी रहती है, फिल्म में बाल विजय का किरदार अच्छे तरीके से स्थापित किया गया है, और खासतौर से संजय दत्त का. फिल्म में संजय बहुत ही डरावने और भयानक लगते है. मूल फिल्म से इस फिल्म में थोडा बदलाब देखने को मिलता है, जैसे की मूल फिल्म विजय (अमिताभ ) का लुक दर्शकों को बहुत पसंद आया था उनके द्वारा पहना हुआ सफ़ेद सूट, आँखों में सुरमा, मुह में पान , बार बार अपना परिचय देना और अजीब तरीके से बैठना, या सब इस फिल्म में गायब है, मूल फिल्म में अमिताभ के संवाद और उनका अभिनय पूरी फिल्म की जान था. पर इस फिल्म में ऋतिक को बहुत कम बोलने का मौका मिला है, ये बात दर्शकों को खटक सकती है. ऋतिक रोशन ने उम्दा अभिनय किया है पर उनके किरदार को मूल फिल्म की तरह न पेश करना थोडा अखर
सकता है, प्रियंका चोपड़ा के लिए कुछ करने के लिए नहीं था. संजय दत्त इस फिल्म की जान है, उनका ये किरदार सालों तक याद रखा जा सकने वाला है, उनके लुक बॉडी लेंग्वेज , संवाद सभी प्रभावित करते है, कह सकते है की ये फिल्म खलनायक प्रधान फिल्म है, फिल्म के अन्य किरदार जैसे गायतोंडे (ओमपुरी ), सूर्या, शांताराम शिक्षा आदि को अच्छी तरह निर्देशक ने पेश किया है, ऋषि कपूर का अभिनय बेहतरीन है, फिल्म के कुछ संवाद बहुत चुटीले है, जैसे की " कमजोर कभी ये नहीं कह सकता की उसने पहलवान को माफ़ किया, उसके लिए उसका पहलवान बनना जरुरी है, ऋषि कपूर का संजय दत्त को कहना " मैंने बदसूरत चेहरे बहुत देखे है पर तेरे चेहरे से घिन टपकती है, "
सकता है, प्रियंका चोपड़ा के लिए कुछ करने के लिए नहीं था. संजय दत्त इस फिल्म की जान है, उनका ये किरदार सालों तक याद रखा जा सकने वाला है, उनके लुक बॉडी लेंग्वेज , संवाद सभी प्रभावित करते है, कह सकते है की ये फिल्म खलनायक प्रधान फिल्म है, फिल्म के अन्य किरदार जैसे गायतोंडे (ओमपुरी ), सूर्या, शांताराम शिक्षा आदि को अच्छी तरह निर्देशक ने पेश किया है, ऋषि कपूर का अभिनय बेहतरीन है, फिल्म के कुछ संवाद बहुत चुटीले है, जैसे की " कमजोर कभी ये नहीं कह सकता की उसने पहलवान को माफ़ किया, उसके लिए उसका पहलवान बनना जरुरी है, ऋषि कपूर का संजय दत्त को कहना " मैंने बदसूरत चेहरे बहुत देखे है पर तेरे चेहरे से घिन टपकती है, "
क्लाइमेक्स में फिल्म का फिल्मांकन अच्छा किया गया है, फिल्म का स्क्रीनप्ले कसा हुआ है, जो कि फिल्म को दर्शकों तक जोड़ता है, निर्देशक कारण मल्होत्रा ने फिल्म पर अच्छी पकड़ बनाई है, फिल्म के गाने " देवा", " गुनगुना" और "चिकनी चमेली " पसंद किये जा रहे है, " चिकनी चमेली " गाने को सही जगह पर रखा गया है, फिल्म कि लोकेशन और सिनेमेटोग्राफी बढ़िया है,
और अंत में 'अग्निपथ " कोई अलग तरह कि फिल्म नहीं है, पर अच्छे अभिनय , स्क्रीनप्ले और बीते दौर कि ड्रामा फिल्मों को याद करने के लिए एक बार देखा जा सकता है,
रेटिंग 3/5
द्वारा
मनेन्द्र यादव

good movie...
ReplyDeletegood movie...
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