Friday, 23 December 2011

Don 2- Movie Review

शाहरुख़ भले ही लाख तरीकों से सबको समझाने की कोशिश करे की 'रा वन' सफल हुई है, पर इन तरीकों से वो सिर्फ खुद की तसल्ली कर सकते है. किसी भी सितारे की फिल्म के हिट या फ्लॉप होने का असर उसकी आने वाली फिल्मों पर जरुर पड़ता है, इसलिए रा वन के पिटने की वजह से "डौन २" की जुड़े लोग भी डरे हुए है, क्योकि शाहरुख़ को दर्शक रोमांटिक फिल्मों में ही ज्यादा पसंद करते है,  जिन फिल्मों में  शाहरुख़ ने इमेज बदलने की कोशिश की है, वो फ़िल्में अच्छा बिज़नस नहीं कर पाई.  जैसे "रा वन " , "बादशाह" ," डुप्लीकेट", "अशोका", "स्वदेस", "फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी" आदि . अब देखते है की "डौन  २"  का हश्र क्या होता है, निर्देशक फरहान अख्तर ने इस फिल्म का जोर शोर से प्रमोशन नहीं किया, हो सकता है कि उन्हें लगता हो कि दर्शक अब शाहरुख़ कि फिल्म के सिर्फ प्रमोशन को देखकर फिल्म देखने नहीं आएंगे.( रा वन का हश्र देखने के बाद ). बहरहाल दुनिया के 41 देशों में आज "डौन २" 2 डी और 3 डी प्रिंटों में रिलीज हुई है.
1978 में अमिताभ बच्चन अभिनीत फिल्म "डौन" का रीमेक फरहान अख्तर ने  " डौन : द चेज बिगिन्स अगेन" 2006 में बनाया. और अब 2011 में उसका सीक्वल " डौन 2 : द किंग इज बैक" आज रिलीज हुआ. किसी फिल्म के रीमेक को बनाने में ज्यादा सोचने कि जरुरत नहीं होती क्योकि सबकुछ सामने होता है और उसे कॉपी करना पड़ता है, लेकिन "डौन २" में निर्देशक ने अपने लेखकों के साथ मिलकर कुछ होलीवुड फिल्मों का थोडा थोडा मसाला डालकर इस सीक्वल को लिखा.
डौन  (शाहरुख़ खान ) पिछली बार धोखे से पुलिस से बचकर निकल गया था, अब पूरे एशिया पर कब्ज़ा जमाने के बाद यूरोप को टारगेट बनता है, जिसके लिए उसे वर्धान (बोमन ईरानी ) की मदद चाहिए, लेकिन वो मलेशिया कि जेल में बंद है. इसलिए डौन  मलिक (ओमपुरी ) और रोमा (प्रियंका चोपड़ा ) के सामने सरेंडर करके उसी जेल में जाता है , जिसमे वर्धान को रखा गया है,
डोन एक टेप के जरिये जेके दीवान और एक जर्मनी के बैंक के प्रेसिडेंट को ब्लैकमेल करना चाहता है लेकिन वो टेप एक लॉकर में रखा है. डौन और वर्धान के पास एक एक चाबी है, जिनके जरिये वो लॉकर खुलता है, डौन और वर्धान जेल से भाग निकलते है, दोनों उस टेप को जेके दीवान को दिखाकर बैंक में रखी यूरो करंसी छापने कि प्लेट का एक्सेस कोड चाहते है, डौन उन प्लेट की सहायता से यूरो छापकर अमीर बनना चाहता है. दीवान एक गुंडे जब्बार के जरिये डोन को ख़त्म करने कि  कोशिश करता है, पर डौन उसे अपने साथ मिला लेता है, एक्सेस कोड पाने के बाद डौन को भारी सुरक्षा में रखी प्लेट को चुराने के लिए  टेक्निशियनों को जरुरत पड़ती है, जिसके लिए वो समीर (कुनाल कपूर ) को मिला लेता है, प्लेट मिलने के बाद जब्बार और वर्धान मिल जाते है और डौन को समीर कि सहायता से पुलिस को पकडवा देते है,  इसके बाद फिल्म में कुछ उतर चदाव आते है, जिसको थ्रिल और सस्पेंस के साथ पेश किया गया है, फिल्म के पहले हाफ में थोड़ी बोरियत सी हो सकती है, क्योकि बहुत सारी प्लानिंग होती है, और सेकंड हाफ में जब प्लान के अनुसार कहानी बदती है तब दर्शकों कि दिलचस्पी बदने लगती है, क्लाइमेक्स काफी बड़ा दिखाया गया हैं, और अंत में डौन 3 के लिए गुंजाईश भी रखी गई है ,
तकनीकी रूप से फिल्म बहुत सशक्त है, फरहान ने कहानी को बड़े स्टाइलिश तरीके से पेश किया है, सेकंड हाफ में कई ऐसे दृश्य आते है जो दर्शकों को चौंका सकते है, यही भाग फिल्म को दिलचस्प बनाता है,ऋतिक रोशन वाले दृश्य को बिना वजह ठूसा गया है,  डौन का किरदार नकारात्मक होते हुए भी दर्शकों का  समर्थन पाता है, शाहरुख़ का अभिनय अच्छा है, कई दृश्य में ओवर एक्टिंग के शिकार हुए, प्रियंका चोपड़ा के करने के लिए कुछ नहीं था, फिल्म में रोमांस के लिए जगह नहीं है, बोमन, ओमपुरी, कुनाल कपूर, नवाब शाह का अभिनय उल्लेखनीय है, लारा दत्ता का उपयोग नहीं हो पाया, शंकर एहसान लॉय का संगीत निराशाजनक है, फिल्म का एक भी गाना लोकप्रिय नहीं हो पाया,
संक्षेप में कहा जाये तो फिल्म स्टाइलिश है, और ध्यान से देखने वाले दर्शकों का मनोरंजन कर सकती है, जिसके लिए एक बार देखा जा सकता है, 

स्टार 2 .5 / 5

मनेन्द्र यादव

Monday, 12 December 2011

ladies vs ricky bahl- review

निर्देशक मनीष शर्मा की " बैंड बाजा बारात" के अच्छे बिज़नस को देखते हुए, यश कैंप ने पूरी टीम को उपहार स्वरुप एक और फिल्म बनाने का मौका दिया. फिल्म का प्रमोशन भी जमकर किया गया जैसा की आजकल हर फिल्म की अच्छी ओपनिंग के लिए जरुरी हो गया है,
फिल्म में रिक्की बहल (रणवीर सिंह) एक बहरूपिया है जो की नाम, रूप बदल कर भारत के कई शहरों में लड़कियों को अपने जाल में फंसाता है, और उनसे लाखों रूपये की ठगी करता है, लडकियां अपना पैसा वापस लेने और बदला लेने की नीयत से एक बहुत तेज तर्रार लड़की ईशिका (अनुष्का) को तैयार करती है, फिर कैसे रिक्की बहल सुधर जाता है, ये फिल्म में दिखाया गया है,
फिल्म का पहला भाग थोडा मनोरंजक है, क्योंकि उसमे रिक्की बहल, लड़कियों को बेवकूफ बना कर ठगता है, जिस तरह बड़ी आसानी से लड़कियों और उनके परिवार वालों को बेवकूफ बनाता है वो कुछ गले से नहीं उतरते. यहाँ फिल्म के मनोरंजक के नाम पर ज्यादा छूट ले ली गई है, सेकंड हाफ में फिल्म बोरियत की शिकार हो जाती है, मनोरंजन का स्तर गिरने लगता है, फिल्म खिची खिची सी लगने लगती है, दर्शकों में फिल्म से दूर होने लगते है, अंत भी दर्शकों को निराश कर सकता है, जब लड़कियां रिक्की को बेवकूफ बनाने की कोशिश करती है, उन दृश्यों को ठीक से नहीं लिखा गया. स्क्रीनप्ले भी निराश करता है, निर्देशक ने दर्शकों को खुश करने के चक्कर में  रोमांस दिखाया गया है, जो की जबरदस्ती का ठूसा हुआ लगता है.

अनुष्का शर्मा को जिस तरह तेज तर्रार दिखाया है उस तरह के सीन नहीं लिखे गए, रणवीर का किरदार पहली फिल्म (बैंड बाजा बारात) और इस फिल्म में लगभग एक सा ही नजर आता है, फिल्म के अंत में जिस तरह रणवीर का किरदार शांत हो जाता है और सुधर जाता है, वहा पर ज्यादा मेहनत नहीं की गयी. उसके बुरे आदमी से भले बननी की कहानी दिलचस्प नहीं है.
रणवीर ने अच्छा प्रयास किया है, अनुष्का कही कही ओवर एक्टिंग का शिकार हो गई, परिणिति चोपड़ा, दीपानिता शर्मा, अदिति शर्मा ने ठीक काम किया है, जिसमे परिणिति चोपड़ा के कुछ दृश्य याद रहते है, सलीम सुलेमान ने फिल्म का संगीत अच्छा दिया है, जिसमे " आदत से मजबूर" गाना याद रहता है,

संक्षेप में कहा जाये तो  " लेडिस वर्सेस रिक्की बहल" में मनोरंजन की उम्मीद करना बेकार है.
स्टार 1.5 /5


मनेन्द्र यादव