Friday, 30 September 2011

Force - Movie Review

जब से बॉलीवुड में दबंग और सिन्घम में सौ करोड़ से ज्यादा का बिज़नस किया है तबसे लगता है सभी दक्षिण भारतीय फिल्मों के रिमेक बनाने में जुट गए है,  ताज़ा फिल्म 'फ़ोर्स' भी दक्षिण भारतीय फिल्म 'काखा काखा' का हिंदी रिमेक है ,जिसे निर्देशित  किया है निशिकांत कामत ने. पर ये फिल्म दबंग और सिन्घम से कोसों दूर है . हिंदी सिनेमा की सबसे सामान्य कहानी यानी कि एक ईमानदार, बहादुर और  नेक  पुलिस ऑफिसर की एक दुष्ट खूंखार अपराधी से भिडंत होना और  आखिरी में नायक का खलनायक को मार गिराना, फोर्स की कहानी भी कुछ इसी तरह की है. 

एसीपी यशवर्धन ( जॉन अब्राहिम ) एक ईमानदार, बहादुर इंसान है, जो कि किसी तरह के रिश्तो में नहीं उलझना चाहता क्योकि उसका मानना है कि रिश्तो से इंसान कमजोर हो जाता है , जिससे दुश्मन उसकी कमजोरी का फायदा उठा सकता है, इसलिए वह लड़कियों से भी दूर रहता है,जिसके कारण उसके साथी यश को सूखा पेड़ कहते है  इसके बावजूद भी माया ( जेनेलिया डिसूजा ) उसका दिल जीत लेती है और यश को माया से प्यार हो जाता है. विष्णु (विद्युत् जमवल) नाम का अपराधी एक मुखबिर के जरिये सूचना देकर अपने दृग्स और स्मगलिंग के धंधे में अपने प्रतिद्वंदी को जॉन के द्वारा मरवा देता है, इस बात का यश को पता चलते ही वो विष्णु को पकड़ने में लग जाता है, एक माल में दृग्स का लें दें करते समय विष्णु का बड़ा भाई (मुकेश ऋषि ) यश और उसके साथियों अतुल , कमलेश और अन्य के हाथों मारा जाता है जाता है, जिसके कारण पुलिस डिपार्टमेंट इन चारों ऑफिसर्स को सस्पेंड कर देता है, विष्णु अपने बड़े भाई की मौत का बदला लेना चाहता है, फिर शुरू होता है, इन चारों ऑफिसर्स और विष्णु का लुका छिपी का खेल. और अंत में विष्णु किस तरह मारा जाता है. ये फिल्म में एक्शन के साथ दिखाया गया है,
फिल्म का पहला हाफ रोमांटिक है ,जिसमे जेनेलिया और जॉन का प्रेम प्रसंग दिखाया है , लडकियों से सामान्यता दूर रहने वाले जॉन को जेनेलिया अपनी प्यारी और मासूम बातों से प्यार करने को मजबूर कर देती है, इस हिस्से में कुछ अच्छे सीन देखने को मिलते है,  दूसरे हाफ में रोमांस गायब हो जाता है, एक्शन शुरू हो जाता है, पर कहानी सधी हुई तब से लगती है जब से विष्णु, जॉन के घर पर हमला करता है, उससे पहले तक की कहानी सिर्फ खाली जगह को भरने  जैसी लगती है, एक्शन फिल्म में अच्छा है, कुछ सीन दर्शकों को पसंद आ सकते है जैसे गली के गुंडों का तेजाब डालने वाला सीन, विष्णु और जॉन का पहला सामना.जॉन का चेहरा भावहीन रहता है जो इस तरह के कैरेक्टर के लिए उपयुक्त है , जेनेलिया ने जॉली गर्ल का किरदार खूब निभाया है, विष्णु जब जब स्क्रीन पर आते है अच्छा लगता है उन्होंने स्टंट भी अच्छे किये है , जॉन की बॉडी का खूब प्रदर्शन किया गया है, निर्देशक को स्क्रिप्ट का साथ नहीं मिला , इस तरह की कहानी का दर्शकों को पसंद आना मुश्किल है , फिल्म का संगीत ज्यादा लोकप्रिय नहीं हो पाया है.
संक्षेप में कहा जाये तो  इस फिल्म के बजाय कोई और फिल्म देखना ज्यादा ठीक है
स्टार 1 .5

द्वारा
मनेन्द्र यादव

Friday, 23 September 2011

मौसम - फिल्म समीक्षा

आखिरकार इस हफ्ते 'मौसम' रिलीज़ हो ही गई, पहले वायु विभाग फिर रेल विभाग कि आपत्ति के चलते फिल्म कि रिलीज़ डेट को एक हफ्ते आगे सरकाया गया. फिल्म में 1992 में बाबरी मस्जिद के गिराने से पहले से लेकर अगले 10 साल तक कि कहानी को पौने तीन घंटे कि लम्बी फिल्म में दिखाया गया है, जिस तरह मौसम बदलते है उसी तरह फिल्म कि कहानी में लोकेशन पहले पंजाब, स्कॉट्लैंड, फिर पंजाब, फिर स्कॉट्लैंड और अहमदाबाद बदलती है. चूंकि राइटर और डायरेक्टर खुद पंकज कपूर है इसलिए उन्होंने अपनी फिल्म में कांटछांट की हिम्मत नहीं जुटाई. फिल्म की लम्बाई 40 -50 मिनट कम होना चाहिए थी जिससे  फिल्म थोड़ी कस जाती और दर्शक फिल्म में अधिकांशत: बोर होने से बच जाते.  वैसे भी आजकल दर्शक और मल्टीप्लेक्स मालिक ज्यादा लम्बी फ़िल्मों से बचते है.

पंजाब के एक गाँव  में रहने वाला हैरी (शाहिद कपूर) और उसी  गाँव में नई नई रहने आई आयत (सोनम) एक दूसरे को पसंद करने लगते है. लेकिन अचानक से आयत अपने परिवार के साथ गाँव छोड़कर चली जाती है, इधर हैरी एयरफोर्स में ज्वाइन करता है और स्कॉट्लैंड चला जाता है. वहां उसकी मुलाकात आयत से होती है कहानी कुछ और आगे बढती है पर अचानक से कारगिल का युद्ध शुरू होने के कारण हैरी को, आयत को बिना बताये भारत आना पड़ता है,  हैरी के युद्ध में घायल हो जाने के कारण उसका इलाज चलता है, उधर आयत हैरी को ढूढती हुई उसके गाँव जाती है, और जब कुछ पता नहीं चलता तो गाँव कि एक लड़की को हैरी के लिए एक ख़त दे जाती है, पर वो लड़की भी हैरी को चाहती थी इसलिए हैरी को ख़त नहीं देती. हैरी के शरीर का आधा हिस्सा लकवाग्रस्त हो जाता है, वो स्विट्जरलैंड में रहने वाली बहन को आयत के घर भेजता तो पता चलता है कि आयत ने स्कॉट्लैंड छोड़ दिया है. कुछ महीनो बाद हैरी स्विट्जरलैंड में आयत को अपने कजिन और उसके बच्चों के साथ देखता है तो समझता है कि उसकी शादी हो गई है और वापस अपने गाँव लौट आता है, 9 /11 की घटना के कारण आयत फिर से भारत लौटकर अहमदाबाद में रहने लगती है. इधर हैरी अहमदाबाद एक शादी में जाता है, फिर अहमदाबाद में दंगे छिड़ते है और इसी दौरान दोनों का मिलन होता है

कहानी का पंजाब वाला हिस्सा बड़ा ही खूबसूरत फिल्माया गया है, उस समय का प्यार अपने आप में शालीनता लिए होता था, अपने प्यार का इज़हार कर पाना कितना मुश्किल होता था. प्रेमियों को प्रेमिका की  झलक देखने के लिए क्या क्या नहीं करना पड़ता था. कुछ दिल को छू लेने वाले दृश्य भी लिखे गए है. कहानी जैसे ही पंजाब से बाहर निकलती है, निर्देशक का कण्ट्रोल हट जाता है और फिल्म बोझिल सी हो जाती है.

फिल्म की खूबी इसका संगीत है. गाने मधुर है खासतौर से 'रब्बा', 'इक तू ही' उम्दा है. फिल्म में ढेर सारे संयोग हैं हालाँकि निर्देशक को संयोग का उपयोग करने कि आज़ादी होती है पर एक हद से ज्यादा हो जाने से कारण फिल्म की विश्वसनीयता खो जाती है.कहानी को कुछ बड़ी घटनाओं से जोड़ने की असफल कोशिश की गई है.  शाहिद और सोनम ने अभी तक का उत्कृष्ट अभिनय किया है. पंकज कपूर लेखक से ज्यादा निर्देशक के रूप में प्रभावित करते है.

कई दृश्य दर्शकों को हज़म नहीं होंगे जैसे कि दोनों का देश विदेश में अचानक से सामने आ जाना , सेकण्ड हाफ में कई दृश्यों का दोहराब होना इत्यादि. बिना किसी कारण शाहिद का आयत को शादीशुदा समझना भी तर्कसंगत नहीं लगता .

संक्षेप में कहा जाये तो  ये फिल्म धैर्य मांगती है ,फिल्म में कई अच्छे दृश्य है पर पूरी फिल्म नहीं.
स्टार 2 /5
द्वारा
मनेन्द्र यादव

Saturday, 10 September 2011

Aarakshan Movie review

आरक्षण ------------ नाम में क्या रखा है                                                                                                          


प्रकाश झा ने हमेशा अपनी फिल्मो में सामाजिक मुद्दों को उठाया है, चाहे वो  मृत्युदंड हो, गंगाजल, अपहरण या राजनीति. सभी फिल्मों  में उनके अन्दर समाज को बदलने की सोच दिखाई देती है, इसी वजह से उन्होंने बिहार से चुनाव भी लड़ा था पर वे जीत नहीं पाए. सभी को इस फिल्म से उम्मीद थी की प्रकाश झा ने  शीर्षक के मुताबिक फिल्म में इस मुद्दे का विश्लेषण करके कुछ समाधान दिखने का प्रयास किया होगा. परन्तु उम्मीद के बाहर निर्देशक ने आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दे को केवल सतही स्तर पर छुआ है, जिसके कारण दर्शकों को निराशा हो सकती है.  


फिल्म में दिखाया गया है की शिक्षा का किस तरह से व्यवसायीकरण होता जा रहा है और ये एक बहुत बड़े मार्केट में तब्दील होती जा रही है.  पूरी फिल्म आदर्शवादी, ईमानदार  प्रिंसिपल अमिताभ बच्चन पर केन्द्रित है, जो शिक्षा को व्यापार बनाने और सभी छात्रो को सामान भाव से देखकर उनकी यथाशक्ति सहायता करते हैं.  पर कुछ भ्रष्ट लोगो के द्वारा आरक्षण के नाम पर हुई राजनीती का शिकार होकर सम्मान खोने के बाद अपना इस्तीफ़ा दे देते हैं. और परेशानियों में घिर जाते हैं. फिर किस तरह वो दुनिया की नजरो में अपना खोया हुआ सम्मान पाते है , यही इस फिल्म में कुछ नाटकीय तथा विश्वसनीय  दृश्यों के द्वारा दिखाया गया है, फिल्म की स्क्रिप्ट में कुछ कमियां हैं पर उन्हें नजर अंदाज किया जा सकता है. जैसे की सैफ और दीपिका के प्रेम प्रसंग को अधूरा छोड़ दिया गया और अमित जी को इससे बेखबर रखा गया. इतने बड़े कॉलेज का प्रिंसिपल बैंक के फॉर्म को विश्वास के कारण बिना कैसे पढ़े साइन कर देता है.  फिल्म का पहला सीन काफी प्रभावी है, जिसे देखकर पता चलता है की पूरी फिल्म इसी विषय पर आधारित होगी पर मध्यांतर के बाद फिल्म का ट्रैक बदल जाता है, आरक्षण का मुद्दा बिलकुल गायब हो जाता है  हालाँकि दूसरा हाफ पहले हाफ की अपेक्षा जरा सा कमजोर है, दृश्यों को ज्यादा खीचा गया है , परन्तु दर्शको की रूचि बनी रहती है, फिल्म के अंत को लेखक ने जल्दबाजी में समेत दिया,जो थोडा नाटकीय सा लगता है, इससे और अच्छा होने की संभावनाएं थीं.
        
फिल्म में अमित जी ने अपना  किरदार बेहतरीन तरीके से निभाया है, इस रोल को उनसे बेहतर कोई और नहीं कर सकता था.  सैफ एक दलित मेधावी युवक बने है परन्तु इंटरवल के बाद कुछ उनके पास करने के लिए ज्यादा कुछ नहीं था. दीपिका ने एक सिद्धांतवादी पिता की पुत्री की भूमिका बखूबी निभाई है, प्रतीक के अभिनय में परिपक्वता नहीं दिखती. मनोज वाजपेयी को इसी तरह के रोल करने चाहिए, प्रकाश झा के साथ कम करने से उनके अभिनय का स्टार ऊँचा उठा है. सौरभ शुक्ला, यशपाल शर्मा, मनोज तिवारी, तन्वी आजमी आदि अपने किरदार में जमे है.  प्रकाश झा ने बहुत अच्छे संवाद लिखे है.एक दृश्य के बैकग्राऊंड में वे नजर आते है.

संक्षेप में कहा जाये तो  फिल्म में आरक्षण के नाम पर शिक्षा के व्यवसायीकरण का मुद्दा दिखाया जाता है, तथा युवा छात्रों और बुद्धिजीवी दर्शकों को  पसंद आ सकती है. 
रेटिंग  2.5/5  


द्वारा
मनेन्द्र यादव ,

Mere brother ki dulhan, movie review

"मेरे ब्रदर कि दुल्हन" जैसा कि नाम से ही प्रतीत होता है कि इस फिल्म में क्या होने वाला होगा, शायद यशराज फिल्म्स ने फिल्म का शीर्षक भी इसलिए ऐसा रखा हो जिससे की लोग इस  रिश्ते के अजीब रूप के बारे में चर्चा करे या आपत्ति करे. आखिर दोनों ही स्थिति में फायदा तो फिल्म के collection को ही होना है.फिल्म की पब्लिसिटी में कोई कमी नहीं की गई, कुछ लोगो को इस बात से आपत्ति हो सकती है कि कैसे कोई अपनी होने वाली भाभी के साथ इश्क कर सकता है, अपने भाई को कैसे धोखा दे सकता है, परन्तु फिल्म देखते समय घटनाक्रम इतनी तेजी से चलते है कि ये सब बाते सोचने का वक़्त नहीं मिलता.

लव( अली अब्बास जाफ़र) और कुश(इमरान खान ) दोनों भाई है, इमरान खान अपने बड़े भाई की शादी के लिए परफेक्ट लड़की ढूढने निकलता है, इत्तफाक से उसकी मुलाकात कटरीना से होती है, जिससे वो 5 साल पहले मिला था, इन 5 सालो में कटरीना बहुत बदल जाती है और इमरान उसे अपने भाई के लिए पसंद कर लेता है. शादी कि तैयारिया शुरू हो जाती है, लन्दन से अली जाफ़र इंडिया आने वाला होता है, पर कटरीना चाहती है कि शादी से पहले 2 दिन वो खुल कर मौज मस्ती करे, और इमरान खान उसकी मौज मस्ती में उसका साथ देता है और   ज्यादातर समय कटरीना के साथ गुजारता है.  अली जाफ़र के इंडिया आने के बाद अली और कटरीना एक दुसरे के साथ समय बिताते है, पर कटरीना और इमरान को एक दुसरे के साथ बिताये पल बहुत याद आते है, उन्हें अहसास हो जाता है कि वो एक दूसरे को प्यार करने लगे है. दोनों प्लान बनाते है और ऐसी परिस्थितिया पैदा कर देते है कि सबकी मर्जी से उनकी शादी हो जाती है.

अली जाफ़र ने फिल्म का स्क्रीनप्ले भी लिखा है और निर्देशन भी किया है इसलिए पूरी फिल्म उनके कण्ट्रोल में रहती है, कहानी भटकती नहीं है, पहले हाफ में कहानी बड़ी तेजी से चलती है इंटरवल के बाद कुछ देर बाद फिर से कहानी कि स्पीड बढ़ जाती है, दर्शको के मनोरंजन का स्तर बना रहता है,  इमरान और  कटरीना के प्लान को दिलचस्प और कॉमेडी से भरा हुआ दिखाया जाता है, कटरीना द्वारा भागकर शादी करने योजना पर इमरान द्वारा पिता की इज्ज़त और होने वाली बदनामी के कारण मना करना अच्छा लगता है

परिस्थितिजन्य हास्य होने से फिल्म बहुत मनोरंजक लगती है, कटरीना का रोल प्रमुख है, जिसको उन्होंने अच्छी तरह से निभाया है, ये  बाकी सभी कलाकारों ने भी अच्छी एक्टिंग की है,  पूरी फिल्म में एक कॉमेडी टच बना रहता है, लगता नहीं की ये अली अब्बास ज़फर की पहली फिल्म है.

फिल्म के संगीत से भी फिल्म को फायदा मिला है, टाइटल सॉंग, छूमंतर, इश्क रिस्क अच्छी धुनें है जिन्हें  गुनगुनाते हुए दर्शक सिनेमा हॉल से बहार निकलेंगे.

संक्षेप में कहा जाये तो  हलके फुल्के मनोरंजन के लिए फिल्म को देखा जाना चाहिए.
3 /5

द्वारा -
मनेन्द्र यादव,  दिल्ली